अपने वाले मंत्री जी तो चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री चाणक्य से आगे निकल गए हैं

गुरु जीकी कलम से

चाणक्य तो कुछ समय के लिए राष्ट्र के कार्य के प्रति समर्पित होते थे उस समय ही चाणक्य राष्ट्रीय धन का उपयोग करते थे लेकिन अपने वाले तो मंत्री पद संभालते ही पूरे कुनबे के सथ समर्पित रहते है लगता है इसीलिए उनका पूरा खर्चा कुनबा समेत जनता को उठाना पड़ता है कहते हैं कि आचार्य चाणक्य के पास एक विदेशी यात्री उनसे मिलने आया था। जिस समय वह यात्री चाणक्य से ‌मिलने आया उस समय चाणक्य (विष्णु गुप्त, कौटिल्य) कुछ लिख रहे थे 

 उस समय न तो बडे दीए थे और न ही बिजली थी प्रकाश के लिए तेल केही दीए जलाए जाते थे सायंकाल का समय था एक दीपक के प्रकाश में विष्णु गुप्त चाणक्य कुछ महत्त्वपूर्ण अभिलेख लिख रहे थे, तभी वहां वह यात्री आया । आचार्य चाणक्य ने उस यात्री का स्वागत किया, बैठाया एवं अपने हाथ का अभिलेखन कार्य पूर्ण किया ।

लेखन कार्य पूरा करने के पश्चात आचार्य चाणक्य ने पहले अपने सामने का जलता दीप बुझाया, तत्पश्चात दूसरा दीप जलाया । यह देखकर यात्री अत्यन्त चकित हुआ । उसे लगा कि चाणक्य ने ऐसा कर, किसी भारतीय प्रथा का पालन किया होगा । सम्भवतः भारत में अतिथि के आगमनपर यहां के लोग ऐसा करते होंगे । उसने उत्सुकता बश चाणक्य से प्रश्न किया, ‘आपके देश में ऐसी कोई प्रथा है क्या, जिसके अनुसार अतिथि के आगमनपर जलता हुआ दीपक बुझाकर दूसरा दीपक जलाना पडता है ?’

यात्री की ये बातें सुनकर आचार्य चाणक्य ने कहा, ‘ऐसा नहीं है । मैं अभी जिस दीप के प्रकाश में लिख कर रहा था, वह दीप, उसमें भरा तेल और कार्य तीनों मेरे राष्ट्र के थे । अर्थात, मैं ने अपने राष्ट्र का कार्य राष्ट्र के धन से किया । अब मैं आपसे जो चर्चा करने वाला हूं, वह मेरा व्यक्तिगत विषय है, राष्ट्र का नहीं ! व्यक्तिगत चर्चा में राष्ट्र का तेल न लगे, इसलिए मैंने राष्ट्र का दिया हुआ दीपक को बुझाकर अपना दीपक जलाया है।’

हमारे आचार्यों के विचार इतने उच्च थे कि यह सब जानकर मन चकित हो जाता है । इतनी ऊंचाईपर पहुंचे इन लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि हमें उनका थोडा तो भी अनुकरण करना चाहिए । कितना शुध्द बरताव, कितना शुध्द आचार, कितना शुध्द मन, कितना शुध्द चित्त एवं अंतःकरण रहा होगा उनका ! आप अपने मन में थोडा सोचकर बताइए कि इन आचार्यजी को कौन-सी पदवी देनी चाहिए ? इतने उच्च वैचारिक धरातल के आचार्य को क्या कहें ? हमारे लोग कब सीखेंगे इनसे ? वैसे तो राजनेताओं को इनसे सीख लेनी चाहिए; परन्तु लोग अभागे हैं , कोई सीखना नहीं चाहता ।

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