कलयुग में धर्म का ह्वास अपरिहार्य,लेकिन राजा चाहे तो सीमित कर सकता है कलियुग का प्रभाव

गुरु जी की कलम से
 रामराज में कलयुग से दूर रखने का एक मात्र उपाय है कि स्वर्ण से दूर रहिए। हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार सोना को पास नहीं रखना चाहिए।
 सोने में कलयुग का बास होता है इसीलिए हमारे शुभचिंतक लोगों को स्वर्ण के पीछे भागने से बेहतर स्वर्ण से दूर रहने का सलाह दिया है हमारे धर्म ग्रंथो में लिखा हुआ है किमहाभारत काल में अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित और कलि (कलियुग का प्रतीक) का मिलन श्रीमद भागवत महापुराण) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, जो द्वापर युग के अंत और कलियुग की शुरुआत का संकेत देती ह
 एक बार राजा परीक्षित अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान एक जंगल से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने एक अत्यंत हृदयविदारक दृश्य देखा - एक पुरुष (जो राजा के भेष में था) एक गाय और एक बैल को निर्दयता से पीट रहा था।बैल: धर्म का प्रतीक था, जो कलियुग में तीन पैर गंवाकर केवल एक पैर (सत्य) पर खड़ा गाय जो पृथ्वी (धरती माता) का प्रतीक थी, जो कलि के अत्याचारों से दुखी थी वह पुरुष स्वयं 'कलि' (कलियुग का साक्षात रूप) थाएक धर्मपरायण राजा के रूप में, परीक्षित ने जब निर्दोषों पर अत्याचार होते देखा, तो उन्हें बहुत अधिकक्रोध आया। उन्होंने कलि को दंड देने के लिए अपनी तलवार निकाल लिया वह पुरुष कलि, जो परीक्षित के तेज के सामने टिक नहीं सका, उसने राजा के पैरों में गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगी और कहा कि वह कलयुग का ही रूप है राजा परीक्षित ने शरणागत की रक्षा करने के नियम के अनुसार कलि को जान सेकरने का विचार त्याग करउसे नहीं मारा, लेकिनराजा परीक्षित ने कलयुग को अपने राज्य से बाहर जाने का आदेश दिया।तब कलयुग ने कहाकी महाराज मैं आपके शरण में
हूँमुझे आप देश से ना निकालिए मुझे रहने का कहीं स्थान दे दीजिए कलि ने जब अपने रहने के लिए स्थान मांगा, तो परीक्षित ने कलयुगको 5 प्रमुख स्थानों में रहने की अनुमति दी:राजा परीक्षितने कलयुग से कहकहां की जहाँ झूठ और धोखे का वास ह जहाँ अनैतिक यौ न संबंध हो जहां निर्दोष पशुओं की हत्याहोती होउ न जगहों पर रह सकते हो कलि ने कहा कि इन चार जगहों पर तो झूठ, मद, काम और वैर रहता है, लेकिन उसे और स्थान चाहिए। तब परीक्षित ने उसे सोने (स्वर्ण) में रहने की जगह दी, क्योंकि सोना झूठ, चोरी, हिंसा और तृष्णा का कारण बनता है। चूँकि राजा परीक्षित उस समय स्वर्ण का मुकुट पहने हुए थे, इसलिए कलि ने तुरंत उस मुकुट में प्रवेश कर लिया और समय आने पर इसी के प्रभाव से परीक्षित के मन में ऋषि के प्रति अपमान का विचार आया, जिसके फलस्वरूप उन्हें ऋषि का श्राप मिला। कलयुग और राजापरीक्षित का मिलन
 यह दर्शाता है कि कलियुग में धर्म का ह्रास अपरिहार्य है, लेकिन राजा की सावधानी से उसके प्रभाव को सीमित कियाजा सकता है

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