**चुनावी निष्पक्षता या सत्ता का पुरस्कार? संवैधानिक नैतिकता, विपक्ष का विश्वास और जनता का भरोसा**

पूर्व जज पूर्व लोकसभा प्रत्याशी नगीना मनोज कुमार

पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव और SIR विशेष पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का सलाहकार नियुक्त किए जाने से भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि ये नियुक्तियां कानूनी रूप से वैध हैं क्योंकि IAS अधिकारी विभिन्न सरकारों के अधीन काम करते हैं और चुनाव आयोग के अधिकारियों के लिए कोई सख्त कूलिंग-ऑफ पीरियड निर्धारित नहीं है, फिर भी समय का संयोग और पदों की प्रकृति “सेवा का पुरस्कार” वाली धारणा को बल दे रही है। जब चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करने वाले अधिकारी चुनाव समाप्त होते ही विजयी पार्टी की सरकार के शीर्ष पदों पर आ जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह आशंका पैदा होती है कि क्या चुनाव के दौरान उनकी भूमिका वास्तव में निष्पक्ष थी।

विकसित लोकतांत्रिक देशों में इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाता है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में **revolving door** (घूमने वाला दरवाजा) को नियंत्रित करने के लिए सख्त कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू हैं। अमेरिका में पूर्व सीनेटर दो साल और कांग्रेस सदस्य एक साल तक लॉबिंग नहीं कर सकते। कनाडा में मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए 1 से 5 साल तक की कूलिंग-ऑफ अवधि है, जिसमें पूर्व संबंधों वाले संगठनों या पदों पर नियुक्ति प्रतिबंधित होती है। ब्रिटेन में ACOBA जैसी संस्थाएं सलाह देती हैं, जबकि कई यूरोपीय देशों में पूर्व अधिकारियों को अपने पुराने विभागों से संबंधित मामलों में तुरंत शामिल होने से रोका जाता है। इन देशों का उद्देश्य यही है कि चुनाव या प्रशासनिक भूमिका निभाने वाले व्यक्ति बाद में सत्ता के करीबी पदों पर जाकर निष्पक्षता की धारणा को क्षति न पहुंचाएं।

विपक्षी दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के लिए यह नियुक्ति “न्यूट्रल अंपायर को इनाम” जैसी लग रही है। SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची संशोधन को लेकर पहले से ही TMC ने पक्षपात के आरोप लगाए थे। अब वही अधिकारी नई BJP सरकार के करीबी पदों पर होने से विपक्ष का विश्वास और टूट रहा है। राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा इसे “चोर बाजार” कहना इसी गहरी निराशा और पूर्वाग्रह की भावना को दर्शाता है। लोकतंत्र में हारे हुए पक्ष को यह लगना स्वाभाविक है कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय थी। 

हालांकि विपक्ष की शिकायतों में hypocrisy भी है, क्योंकि जब वे सत्ता में थे तब भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं। फिर भी जनता का भरोसा सिर्फ कानूनी औचित्य पर नहीं टिका होता। संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का मूल सिद्धांत यही है कि शक्तियों का प्रयोग न केवल कानून के अनुसार बल्कि नैतिकता और निष्पक्षता की धारणा को बनाए रखते हुए होना चाहिए। जब चुनाव कराने वाले प्रमुख अधिकारी तुरंत सत्ता संरचना का हिस्सा बन जाते हैं, तो “रिवॉल्विंग डोर” की आशंका मजबूत होती है और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है। 

जनता का विश्वास तभी बना रहेगा जब निष्पक्षता न केवल हो बल्कि दिखाई भी दे। विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए यदि लगातार ऐसे संयोग होते रहेंगे तो आम voter को यह शंका गहराएगी कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम और प्रशासनिक निवेश ज्यादा बनते जा रहे हैं। समाधान के रूप में चुनाव प्रक्रिया से सीधे जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के लिए कम से कम एक-दो साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड, ECI की स्वायत्तता को और मजबूत करना तथा SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में अधिक न्यायिक निगरानी आवश्यक है। 

निष्कर्ष रूप में, पश्चिम बंगाल की ये नियुक्तियां लोकतंत्र को तुरंत तोड़ नहीं रही हैं, लेकिन “दिखने वाली निष्पक्षता” को निश्चित रूप से क्षति पहुंचा रही हैं। संवैधानिक नैतिकता तभी मजबूत होगी जब सत्ता और विपक्ष दोनों संस्थाओं को अपने संकीर्ण हितों से ऊपर रखेंगे और विश्व के अन्य विकसित लोकतंत्रों की तरह नैतिक परंपराओं को मजबूत करेंगे। अन्यथा हर चुनाव जनता के मन में सवाल छोड़ता जाएगा और लोकतंत्र की नींव कमजोर होती जाएगी।

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