दहेज प्रथा और भारत की बेटियां
*दहेज प्रथा और भारत की बेटियां*
एक तरफ हम 21वीं सदी के उस आधुनिक भारत का जश्न मना रहे हैं जो अंतरिक्ष में तिरंगा फहरा रहा है, ग्लोबल इकॉनमी में अपनी धक जमा रहा है और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े नारे बुलंद कर रहा है। लेकिन इसी चमकते भारत के पीछे एक ऐसा अंधेरा कोना भी है, जहां आज भी बेटियां सिर्फ इसलिए मार दी जाती है क्योंकि उनके माता-पिता किसी के बेटे को दहेज में महंगी गाड़ियां नहीं दे पाये
*आखिर कब तक* ? कब तक हम रीति-रिवाजों और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर हो रहे इस संगठित संस्थागत कत्ल को चुपचाप देखते रहेंगे? क्या एक लड़की का अस्तित्व, उसकी शिक्षा, उसकी हंसी और उसकी पूरी जिंदगी बस इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके विदाई के संदूक में कितनी नकदी, कितना सोना या कौन सी गाड़ी रखी है?
जब एक पढ़ा-लिखा परिवार शादी के मंडप में बैठकर कार, फ्लैट या कैश की लिस्ट थमाता है, तो वो शादी नहीं कर रहा होता, बल्कि अपनी संकीर्ण मानसिकता का सौदा कर रहा होता है। क्या हम इतने दरिद्र हो चुके हैं कि हमें अपने बेटों को पालने-पोसने का खर्च बहुओं के पिताओं से वसूलना पड़ रहा है?
हाल ही मे ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर नाम की लड़की की मौत ने एक बार फिर दहेज हत्या और घरेलू हिंसा और उत्पीड़न को बहस का मुद्दा बना दिया है. हालांकि हमारे देश में न तो दहेज की प्रथा नई है और न ही इसके नाम पर होने वाली मौतें या हत्याएं नई है *हालांकि भारत में 1961 से दहेज प्रथा अवैध है,* लेकिन आज भी इस कुरीति के चलते सलाना हज़ारों लड़कियां अपनी जान गंवा रही हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में साल 2024 में दहेज ने करीब 5,737 जानें ली है, यानी हर दिन औसतन 15 से 16 मौत. राज्यवार डेटा देखें, तो 2024 में दहेज प्रताड़ना के कारण उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2,038 मौतें हुईं, वहीं दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहां 1,078 ऐसे मामले सामने आए.इनके बाद तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां 450 मौत के मामले सामने आए हैं. वहीं चौथे नंबर पर राजस्थान में 386 मौतें दर्ज की गई हैं. जबकि पांचवें पर पश्चिम बंगाल है, जहां इस कुप्रथा के चलते 337 जानें गई हैं.
*आत्मनिरीक्षण की जरूरत:*
कानून अपनी जगह काम करता रहेगा, लेकिन जब तक समाज की सामूहिक चेतना नहीं जागेगी, यह आग नहीं बुझेगी। हमें अपनी बेटियों को इस तरह तैयार करना होगा कि वे केवल 'सहनशील' न बनें, बल्कि 'प्रतिरोधी' बनें। उन्हें सिखाना होगा कि अगर शादी की शुरुआत ही सौदेबाजी से हो रही है, तो उस चौखट पर पहला कदम रखने से पहले ही उसे ठुकरा देना बेहतर है।
युवाओं को आगे आना होगा। आज के लड़कों को यह कसम खानी होगी कि वे अपनी शादी में एक रुपया भी दहेज के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। बेटियों के माता-पिता को भी अपनी जमीन-जायदाद बेचकर या कर्ज लेकर 'दिखावे की शाही शादी' करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। अपनी बेटी को इतनी बड़ी डिग्री और काबिलियत दीजिए कि वह खुद अपना भविष्य लिख सके, न कि उसे किसी ऐसे घर में सौंपिए जहां उसकी कीमत सिर्फ एक फरमाइश की लिस्ट जितनी हो।
नीतियों का खोखलापन और सरकार की विफलता
तमाम कड़े कानूनों और 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे बड़े विज्ञापनों के बावजूद इस सामाजिक महामारी का न रुकना सीधे तौर पर सरकारी तंत्र और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की विफलता को उजागर करता है। देश में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 (दहेज मृत्यु) और दहेज निषेध अधिनियम 1961 जैसे कानून कागजों पर बेहद सख्त दिखते हैं, लेकिन अदालतों में इनकी दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) 2% से भी कम है। इसका सीधा मतलब यह है कि अपराधी बेखौफ हैं क्योंकि उन्हें पता है कि पुलिस की ढीली तफ्तीश, गवाहों के मुकर जाने और न्याय में सालों की देरी के चलते वे आसानी से बच निकलेंगे। स्थानीय पुलिस प्रशासन कई बार इन मामलों को घरेलू हिंसा या आपसी रंजिश का नाम देकर रफा-दफा करने की कोशिश करता है, जिससे पीड़ितों का कानून पर से भरोसा उठ जाता है। सरकारें हर साल महिला सुरक्षा के नाम पर करोड़ों का बजट तो आवंटित करती हैं, लेकिन हर जिले में न तो फास्ट-ट्रैक कोर्ट सुचारू रूप से काम कर रहे हैं और न ही प्रताड़ित महिलाओं के लिए कोई मजबूत और सुरक्षित इमरजेंसी शेल्टर होम मौजूद हैं। जब तक राजनीतिक दल महिला सशक्तिकरण को केवल चुनावी रैलियों का भाषण और वोट बैंक का जरिया बनाए रखेंगे और प्रशासनिक मशीनरी को इस गंभीर मुद्दे के प्रति संवेदनशील नहीं बनाएंगे, तब तक बेटियां यूं ही बंद कमरों में जलती रहेंगी और तंत्र सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी में व्यस्त रहेगा।
दहेज सिर्फ़ एक सामाजिक बुराई नहीं,
यह इंसानियत पर लगा ऐसा कलंक है जो हर संवेदनशील समाज को शर्मिंदा करता है।
जब तक बेटियों को बोझ समझने वाली सोच ज़िंदा रहेगी,
तब तक सभ्यता और विकास के सारे दावे अधूरे रहेंगे।
ज़रूरत कानून से पहले सोच बदलने की है।
क्योंकि किसी भी बेटी की जान, किसी भी दहेज से कहीं ज़्यादा कीमती होती है।
पूर्व जज व पूर्व लोक सभा प्रत्याशी, नगीना _मनोज कुमार