पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ता टकराव: ममता बनर्जी, कांग्रेस और बीजेपी पर सियासी बहस तेज


गुरुजी की कलम से

भारतीय राजनीति के कुरुक्षेत्र में ममता बनर्जी का वह आत्मघाती अवतार जिसने अपनों को ही छलकर बंगाल की पावन भूमि पर नफरत के बीज बोए और Indian National Congress की वह खामोश सर्जिकल स्ट्राइक जिसने 2029 की इबारत लिख दी
पश्चिम बंगाल की माटी पर बीजे‌पी के पेड़ को कभी Mamata Banerjee ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की खाद देकर सींचा था आज वही पेड़ अपनी विशाल शाखाओं से टीएमसी के अस्तित्व को हीनि गलने की स्थिति में पहुंच चुका है
 कहा जाता है कि ममता बनर्जी ने सत्ता के मोह में अपनी ही मातृ संस्था कांग्रेस के सीने में खंजर घोंपकर एक ऐसी आग को न्योता दिया था जो अब उनके ही आशियाने को स्वाहा कर रही है।‎
‎ याद करे सन 1997 समयजो आज भी इतिहास के पन्नों मेंदर्ज हैजब ममता बनर्जी ने मुकुल रॉय जैसे नेता से मिलकर
 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को खंडित किया औरएक नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की जिसका एकमात्र एजेंडा वामपंथ को खत्म करने के नाम पर बीजे‌पी जैसी श‌क्तियों के लिए रेड कारपेट बिछाना था।‎
‎ राजनीति के गलियारों में यह चर्चा आज भी आम है कि ममता बनर्जी ने जब कांग्रेस का दामन छोड़ा तो वे केवल एक पार्टी नहीं बल्कि उस धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को कमजोर कर रही थीं जिसने बंगाल को दशकों तक सांप्रदायिक सद्भाव के धागे में पिरोकर रखा था लेकिन उनके भीतर की सत्ता लोलुपता ने उन्हें अंधे रास्ते पर धकेल दिया।‎पुराने जानकारी का कहना है कि
‎ वर्ष 1999 की वह ऐतिहासिकघटना किसी को भूल नहीं रही है जब ममता बनर्जी बीजे‌पी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की पालकी में सवार हुईं और रेल मंत्री का पद संभालकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनके लिए सिद्धांत नहीं बल्कि कुर्सी सर्वोपरि है जिससे बंगाल में पहली बार संघ परिवार के पदचिह्नों को आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई।‎


‎ अगस्त 2001जब ममता बनर्जी ने बिना किसी झिझक के बीजे‌पी को अपना स्वाभाविक सहयोगी घोषित किया था जो इस बात का प्रमाण था कि वे परदे के पीछे से बहुत पहले ही भगवा चोले के प्रति वेआकर्षित हो चुकी थीं।‎
यही नहीं समय आगे बढ़ता गयाऔर सन 2003 में जब Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) के मुख्यसमाचार पत्र पांचजन्य के संपादक तरुण विजय ने उन्हें बंगाल की दुर्गा की उपाधि दी तो यह केवल एक विशेषण नहीं था बल्कि उस गहरी सांठगांठ कापरोक्ष शंखनाद था जिसके तहत संघ ने वामपंथियों के खिलाफ ममता बनर्जी को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।‎
‎ भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने जब संसद के पवित्र गलियारों में ममता को साक्षात दुर्गा का स्वरूप बताया तोकुछ लोगों का कहना है कि यह किसी राजनैतिक गठबंधन की प्रशंसा मात्र नहीं थी बल्कि एक ऐसी गहरी साजिश का हिस्सा था जिसमें कांग्रेस को पूरी तरह अप्रासंगिक बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा था।‎
 आर‌एस‌एस ने जिस तरह ममता बनर्जी के संघर्ष को अपना ठोस समर्थन दिया उसने यह स्पष्ट कर दिया कि नागपुर के मुख्यालय से बंगाल की राजनीति को नियंत्रित करने की स्क्रिप्ट बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी और ममता बनर्जी उस पटकथा की सबसे प्रमुख अभिनेत्री के रूप में अपनी भूमिका निभा रही थीं।‎
 अपने भाषणों में मोहन भागवत और शेषाद्रि चारी जैसे संघी दिग्गजों का नाम लेकर उनकी देशभक्ति का गुणगान करने वाली ममताबनर्जी शायद यह भूल गई थीं कि वे उस विचारधारा की प्रशंसा कर रही हैं जो विविधता में एकता के भारतीय दर्शन को मिटाने पर तुली है और आज वही विचारधारा उनकी पार्टी के सांसदों को अपनी ओर खींच रही है।‎
 वर्ष 2012 में जब आर‌एस‌एस ने पांचजन्य के माध्यम से उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली की तारीफों के पुल बांधे तो वह असल में बंगाल की जनता को भ्रमित करने का एक मनोवैज्ञानिक हथियार था ताकि ममता की छवि को एक ईमानदार राजनेता के रूप में स्थापित कर बीजे‌पी के लिए जमीन तैयार की जा सके।‎
 सन 2019 में जब पूरा देश सीएए और एनआरसी के काले कानूनों के खिलाफ जल रहा था तब ममता बनर्जी का सड़क पर उतरना महज एक ढोंग था क्योंकि जब संसद में मतदान की घड़ी आई तो उनके आठ सांसद रहस्यमयी तरीके से गायब रहे और विधेयक पारित होने का रास्ता साफ हो गया।‎
 मुकुल रॉय का टीएमसी से बीजे‌पी और फिर बीजे‌पी से वापस टीएमसी में आने का जो सर्कस बंगाल ने देखा उसने यह साफ कर दिया कि इन दोनों दलों के बीच का अंतर लगभग खत्म हो चुका है और जैसा कि मुकुल ने खुद कहा था कि बीजे‌पी इज इक्वल टू टीएमसी जो आज शत-प्रतिशत सच साबित हो रहा है।‎
 जुलाई 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान मार्गरेट अल्वा जैसी कद्दावर विपक्षी उम्मीदवार का साथ न देकर ममता बनर्जी ने जिस तरह जगदीप धनखड़ की परोक्ष मदद की उसने समूचे विपक्ष को स्तब्ध कर दिया क्योंकि धनखड़ ने राज्यपाल रहते हुए उनके प्रशासन की नाक में दम कर रखा था।‎
‎ सितंबर 2022 में एक बार फिर ममता बनर्जी ने संघ को अच्छा संगठन बताकर अपने पुराने प्रेम को सार्वजनिक किया जिससे यह संदेह यकीन में बदल गया कि वे केवल सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक समझौता कर सकती हैं चाहे उसके लिए उन्हें लोकतंत्र की बलि ही क्यों न देनी पड़े।‎
‎ वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले जब नीतीश कुमार ने बड़ी मेहनत से इंडिया गठबंधन को खड़ा किया तो ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत अहं के कारण संयोजक पद पर उनके नाम का तीखा विरोध किया जिससे खिन्न होकर नीतीश पुनः बीजे‌पी के पाले में चले गए और विपक्ष को अपूरणीय क्षति हुई।‎
 चुनाव के मैदान में अकेले उतरने का उनका फैसला वास्तव में बीजे‌पी को वॉकओवर देने जैसा था क्योंकि उन्होंने जानबूझकर धर्मनिरपेक्ष वोटों का बिखराव किया ताकि उनके गुप्त सहयोगियों को केंद्र की सत्ता पर दोबारा कब्जा करने में कोई कठिनाई न हो लेकिन कांग्रेस की पैनी नजर ने सब भांप लिया था।‎
‎ कांग्रेस पार्टी ने बिना किसी शोर-शराबे के और बिना कुल्हाड़ी उठाए जिस तरह से राजनैतिक शतरंज पर अपनी चालें चली हैं उसने बीजे‌पी और टीएमसी दोनों के गठजोड़ को बेनकाब कर दिया है क्योंकि कांग्रेस का लक्ष्य केवल सत्ता नहीं बल्कि 2029 में एक नए भारत का निर्माण करना है।‎
 संघ ने भले ही 100 साल की तपस्या करके मोदी जैसा व्यक्तित्व पैदा किया हो लेकिन स्वर्गीय राजीव गांधी ने जाते-जाते Rahul Gandhi जैसा निडर और Priyanka Gandhi Vadra जैसी जुझारू देशभक्त संतानें दीं जिन्होंने सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में बीजे‌पी के चक्रव्यूह को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है।‎
 सोनिया गांधी की उस ममता और त्याग को सलाम करना होगा जिसने अपने बच्चों को पद का लालची बनाने के बजाय देश के लिए लड़ने वाला सिपाही बनाया जो आज बीजे‌पी के बिछाए हुए जाल को अपनी बुद्धिमानी से काट रहे हैं और ममता बनर्जी अब खुद उसी जाल में फड़फड़ा रही हैं
 आज बीजे‌पी ने टीडीपी, जेडीयू और शिवसेना जैसे दलों कोउनकी हैसियत और असली औकात बता दिया वह अब टीएमसी को भीअपने चंगू में जा करने का भरपूर कोशिश कर रहा हैलगता हैकी कीत्रिमूलकांग्रेसटीएमसी सांसदों का भी कई वह हाल ना हो
जो अभी कुछ दिन पहलेआपके सांसदों का हुआ है
 ममता बनर्जी आज वही फसल काट रही हैं जो उन्होंने 1997 में कांग्रेस को तोड़कर बोई थी जो कि नियति का न्याय ही कहा जाएगा।‎
‎ बंगाल की राजनीति में अब टीएमसी के सांसदों का भविष्य भी राघव चड्ढा की तरह अनिश्चित होना तय है क्योंकि जब आप सांपों को दूध पिलाते हैं तो एक दिन वे आपको ही डसते हैं और ममता बनर्जी की यह राजनैतिक चूक उन्हें इतिहास के धूल भरे पन्नों में समेटने की ओर अग्रसर है 😏‎

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