एक मई दिवस यानी श्रमिकों के सम्मान का दिन।


गुरु जी की कलम से
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपने कंधों पर ढोने वाले वे ‘श्रमजीवी’  जिनकी कलम दूसरों को न्याय दिलाती है पर वे खुद सामाजिक सुरक्षा के अभाव में दम तोड़ रहे है?
 लखनऊ प्रेस क्लब में आयोजित यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के कार्यक्रम ने एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है जो उत्तर प्रदेश के हजारों पत्रकारों, छायाकारों, पेज डिजाइनर्स और डेस्क सहयोगियों के भविष्य से जुड़ी है।

अखबारों और पोर्टल्स की सुर्खियां बनाने वाली संपादकीय टीम का सबसे बड़ा हिस्सा ‘गैर-मान्यता प्राप्त’ श्रेणी में आता है। इनकी संख्या बहुत बड़ी है। फील्ड में पसीना बहाने वाले रिपोर्टर हों या, रात-रात भर जागकर पन्ने सजाने वाले डिजाइनर या कैमरे के पीछे छिपे छायाकार, इन लोगो की संख्या मान्यता प्राप्त पत्रकारों से कहीं ज्यादा है।
 ,पत्रकारों कोसरकार द्वारादी जाने वाली सरकारी सुविधाओं की हर फाइल ‘मान्यता’ की दहलीज पर आकर रुक जाती है।

मान्यता के चक्कर में इन श्रमिक पत्रकारों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है। सरकार से न आयुष्मान कार्ड, न ही किसी प्रकार की पेंशन, न महंगाई भत्ता। अखबारों की मशीन चलाने वाले कर्मचारी और डेस्क पर काम करने वाले संपादकीय सहयोगियों को तो अक्सर ‘श्रमजीवी’ की श्रेणी में भी नहीं गिना जाताहै


कई साल का अनुभव, फिर भी पहचान नहीं

प्रदेश में ऐसे हजारों पत्रकार हैं जो 20 से 25 वर्षों से सक्रिय हैं, लेकिन मान्यता के जटिल नियमों के कारण सामाजिक लाभों से वंचित हैं।
उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्रीमाननीय अनिल राजभर 3 मई को केंद्रीय श्रम मंत्री से ईपीएफओ की न्यूनतम पेंशन ₹1000 से बढ़ाकर ₹5000 करने पर वार्ता करने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश केमाननीय श्रम मंत्रीअनिल राजभर का
यह कार्यसराहनीय है, 
 यूनियन और आम पत्रकारों की माननीय मंत्री जी से हम मांग है कि इस सुरक्षा चक्र का दायरा बढ़ाया जाए।

पत्रकारों की सीधी मांग  है। कि प्रदेश के हर उस पत्रकार और संपादकीय सहयोगी को 5 से 10 लाख की कैशलेस चिकित्सा मिले जो पत्रकारिता का काम शुरू किया है। उन्हें अनिवार्य कवरेज मिले जो कम से कम 10 साल से सक्रिय है, चाहे वह मान्यता प्राप्त हों या न हों। गैरमान्यता वाले पत्रकार चाहते हैं कि सेवानिवृत्ति पर न्यूनतम ₹10,000 की मासिक पेंशन की व्यवस्था सभी सक्रिय श्रमजीवियों के लिए हो।
पत्रकारों की इस   मांग परउत्तर प्रदेश की राज्य सरकार इस पर ध्यान देगी तो यह सरकार के लिएबहुत मुश्किल नहीं है।सरकार को चाहिए कि  जोखिम भरी रिपोर्टिंग करने वाले हर छायाकार और रिपोर्टर का अनिवार्य बीमा हो।

यूनियन के प्रादेशिक अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी और प्रेस क्लब अध्यक्ष रविंद्र कुमार सिंह ने साफ किया कि आज पत्रकारिता के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। स्वस्थ आलोचना पर बढ़ते मुकदमे और कोरोना काल के बाद छिनी गई रेल रियायत जैसी सुविधाओं ने पत्रकारों को आर्थिक और मानसिक रूप सेऔर  कमजोर किया है। हिंद मजदूर महासभा के उमाशंकर मिश्र ने आगाह किया कि वेज बोर्ड खत्म होना और ड्यूटी के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 किया जाना पत्रकारों के हित में नहीं है।

जो जमीन पर रहकर काम करने वाले पत्रकार हैं और किसी तरह की मान्यता भी नहीं है, शहर गांव व कस्बों के उन पर ध्यान देना जरूरी है। राज्य व केंद्र सरकार को यह विचार करना होगा कि ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ और ‘सामाजिक सुरक्षा’ का लाभ का दायरा निचले स्तर तक पहुंचे। यदि लोकतंत्र का यह स्तंभ मजबूत रखना है, तो डेस्क पर काम करने वाले उस ऑपरेटर और गली-कूचों से खबर लाने वाले उस गैर-मान्यता प्राप्त रिपोर्टरों,व अन्य टीम सदस्यों को भी ‘श्रमजीवी’ मानकर उसे पेंशन और चिकित्सा का सुरक्षा कवच देना होगा।

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