*पश्चिम बंगाल 2026 के परिणामों का उत्तर प्रदेश 2027 पर 'डिकपलिंग' (Decoupling) प्रभाव क्यों नहीं पड़ेगा:*

​राष्ट्रीय राजनीति में एक आम धारणा यह होती है कि एक बड़े राज्य (जैसे पश्चिम बंगाल) में प्रचंड जीत का 'सुनामी प्रभाव' (Domino effect) आगामी चुनावों (जैसे उत्तर प्रदेश) को एकतरफा बना सकता है। हालांकि, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और चुनावी सांख्यिकी का एक सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि दोनों राज्यों की राजनीतिक तासीर, ऐतिहासिक विकास, सामाजिक संरचना और तात्कालिक चुनावी समीकरणों में बुनियादी और अपरिवर्तनीय अंतर हैं। इसलिए, पश्चिम बंगाल के परिणाम उत्तर प्रदेश में 'डिकपल्ड' (Decoupled - अलग-थलग) रहेंगे और उनका कोई सीधा, यांत्रिक या मनोवैज्ञानिक असर यूपी के 2027 चुनावों पर नहीं पड़ेगा। 

 *कारण* 

1.बंगाल में टीएमसी की सरकार थी और भाजपा विपक्ष में थी ,टीएमसी के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी थी जो लगातार 15 साल से बंगाल में सरकार में थी ,वही यूपी में भाजपा के खिलाफ एंटीइनकंबेसी है तो जिस तरह से टीएमसी को हराकर कर भाजपा सरकार में आगई है बंगाल में उसी तरह से समाजवादी पार्टी भी भाजपा को हराकर 2027 में सरकार बनाएगी ।

2.PDA समाज इक जुट होकर जिस तरह से 2024 में भाजपा को यूपी में हराया था वही फॉर्मूला अब 2027 में भी काम करेगा क्योंकि 2024 के चुनाव में जिस तरह से यूपी में बीजेपी की हार हुई थी वो केवल केन्द्र सरकार का फेल्योर नहीं था क्योंकि बीजेपी के प्रदेश सरकार से PDA समाज में काफी आक्रोश में था ।

3. यूपी में SIR का असर बंगाल से कम पड़ने का संभावना है क्योंकि उत्तर प्रदेश में भी चुनाव आयोग ने एसआईआर 2.0 (SIR 2.0) लागू किया है, लेकिन इसके क्रियान्वयन की प्रकृति और पैमाने में भारी भिन्नता है। यूपी में 2 करोड़ से अधिक मतदाताओं (कुल मतदाताओं का लगभग 13.2%) के नाम काटे गए, लेकिन इसके साथ ही 84.3 लाख (8.43 मिलियन) नए मतदाताओं को जोड़ा भी गया, जो पूरे देश में सर्वाधिक है 

​4.पश्चिम बंगाल चुनाव मुख्य रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), जनसांख्यिकीय परिवर्तन और अवैध घुसपैठियों जैसे वृहद राष्ट्रीय और सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लड़ा गया । बंगाल एक सीमावर्ती राज्य है, जहाँ इन मुद्दों का सीधा भावनात्मक प्रभाव पड़ता है।
​इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश 2027 का चुनाव पूरी तरह से स्थानीय, आर्थिक, जनसांख्यिकीय और रोजगार के मुद्दों पर लड़ा जाएगा। अखिलेश यादव ने अपनी पूरी रणनीति को अति-स्थानीय (Hyper-local) विषयों पर केंद्रित किया है—जैसे कमर्शियल एलपीजी (LPG) के बढ़ते दाम, बिजली विभाग में स्मार्ट मीटरों की अनियंत्रित गड़बड़ियां, और आउटसोर्सिंग के माध्यम से सुरक्षित सरकारी नौकरियों का खात्मा । और ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा के शासन में नौकरियां कम हो रही हैं और महंगाई आसमान छू रही है, जिससे युवा, बेरोजगार और आरक्षित वर्ग गहरे असंतोष में हैं।

5.उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति पूर्णतः भिन्न आधारों पर खड़ी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति मूल रूप से गहराई तक पैठी जातिगत अस्मिताओं (Caste identities) पर आधारित है । अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता जॉर्ज एकरलोफ (George Akerlof) के 'पहचान के अर्थशास्त्र' (Economics of Identity) के सिद्धांत के अनुसार, जब पहचान (चाहे वह जाति हो या धर्म) बहुत मजबूत होती है, तो यह विकास की राजनीति (Development politics) या किसी भी राष्ट्रीय आख्यान पर हावी हो जाती है । उत्तर प्रदेश में मतदाता का राजनीतिक व्यवहार मुख्य रूप से उसके सामाजिक-जातिगत समूह (Ethnic voter blocs) द्वारा निर्देशित होता है ।

मेरे राय में
मनोज कुमार (पूर्व जज व पूर्व लोक सभा प्रत्याशी, नगीना)

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