राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के 17 सांसदों सहित कुल 52 लोगों के नाम लेकर जांच की सिफारिश की गई है।

आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, संचारमंत्री और सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों सहित कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। 24 भदौ की घटना में जुड़े राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के 17 सांसदों सहित कुल 52 लोगों के नाम लेकर जांच की सिफारिश की गई है। ‘टीओबी’ सहित दो समूहों पर भी जांच और कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। आयोग का निष्कर्ष है कि ‘टीओबी’ के उकसावे के कारण 23 भदौ का आंदोलन हिंसक हुआ।
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय नेपाल से




नेपालराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने जांच आख्या में यह निष्कर्ष निकाला है कि पिछले वर्ष 23 भदौ को हुए जेन–जी आंदोलन में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और अगले दिन 24 भदौ को पूर्व योजना के तहत संगठित रूप से आपराधिक गतिविधियाँ की गई थीं। आयोग ने मानवाधिकार उल्लंघन में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने तथा आपराधिक गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों पर आगे जांच करने की सिफारिश सरकार से की है।

आयोग ने 23 भदौ को ही सदस्य लिली थापा के नेतृत्व में 6 सदस्यीय समिति बनाकर घटना की जांच शुरू की थी। समिति द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के दो महीने बाद बुधवार को आयोग ने रिपोर्ट के सिफारिश वाले हिस्से को सार्वजनिक किया। उसी दिन आयोग ने अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री कार्यालय को भी भेज दी।

आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, संचारमंत्री और सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों सहित कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। 24 भदौ की घटना में जुड़े राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के 17 सांसदों सहित कुल 52 लोगों के नाम लेकर जांच की सिफारिश की गई है। ‘टीओबी’ सहित दो समूहों पर भी जांच और कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। आयोग का निष्कर्ष है कि ‘टीओबी’ के उकसावे के कारण 23 भदौ का आंदोलन हिंसक हुआ।

23 भदौ की घटना में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, गृहमंत्री रमेश लेखक और संचारमंत्री पृथ्वीसुब्बा गुरुङ को मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी माना गया है। आयोग ने संविधान की धारा 249 की उपधारा 2(ग) के तहत उनके खिलाफ अदालत में मामला चलाने की सिफारिश की है। इससे पहले गौरीबहादुर कार्की के नेतृत्व वाली जांच आयोग ने भी उन पर हत्या के अपराध में जांच और मुकदमा चलाने की सिफारिश की थी।

आयोग ने कहा कि वर्तमान कानूनों में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, इसलिए मानवता और मानवाधिकार के अपराधों के लिए नया कानून बनाकर दंड सुनिश्चित किया जाए। इस संबंध में आयोग ने सर्वोच्च अदालत के फैसले का भी उल्लेख किया है। अधिवक्ता माधव बस्नेत द्वारा दायर मामले में सर्वोच्च अदालत ने सिद्धांत स्थापित कर दिया है, इसलिए कार्रवाई और दंड के लिए नया कानून आवश्यक बताया गया है।

आयोग ने अधिकतम 6 महीने की कैद, 3 लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों सजाओं का प्रावधान रखने की सिफारिश की है। इन मामलों की सुनवाई के लिए अलग विशेष अदालत बनाने की भी अनुशंसा की गई है। आयोग ने यह भी कहा है कि दोषियों को कम से कम 6 वर्षों तक राजनीतिक नियुक्ति या चुनाव लड़ने से रोका जाए। यदि ऐसा कानून बनता है तो वे अगले प्रतिनिधि सभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे। साथ ही प्रशासनिक जिम्मेदारी और विदेश यात्रा पर कम से कम 3 वर्षों तक प्रतिबंध लगाने की भी सिफारिश की गई है।

गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन को छोड़कर अन्य मामलों में पीड़ित और अदालत की अनुमति से सार्वजनिक माफी, उचित मुआवजा और दंड योग्य क्षमादान की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है। आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि मुकदमा दर्ज होते ही किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को स्वतः निलंबित किया जाए।

आयोग ने नेपाल पुलिस के तत्कालीन महानिरीक्षक चन्द्रकुबेर खापुङ, सशस्त्र पुलिस बल के तत्कालीन महानिरीक्षक राजु अर्याल और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के तत्कालीन प्रमुख हुतराज थापा के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है। आयोग ने सरकार से कहा है कि उन्हें भविष्य में किसी भी सरकारी सेवा की जिम्मेदारी न दी जाए। गोली चलाने वाले सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ भी विस्तृत जांच कर कार्रवाई करने की बात कही गई है।

आयोग ने नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की, सशस्त्र पुलिस के महानिरीक्षक नारायणदत्त पौडेल, पुलिस नायब महानिरीक्षक ओम राना, वरिष्ठ पुलिस उपरीक्षक विश्व अधिकारी, सशस्त्र पुलिस उपरीक्षक जीवन केसी और राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के तत्कालीन निदेशक कृष्ण खनाल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है। काठमांडू के तत्कालीन प्रमुख जिला अधिकारी छविलाल रिजाल और 23 भदौ को बानेश्वर तथा संसद भवन क्षेत्र में तैनात सुरक्षा अधिकारियों पर भी मानवाधिकार उल्लंघन के लिए विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की गई है।

आयोग ने कहा कि राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा और आम नागरिकों के मानवाधिकार संरक्षण में नेपाली सेना अपेक्षित भूमिका निभाने में असफल रही। आयोग ने भविष्य में ऐसे मामलों में गंभीरता से राष्ट्रीय संपत्ति और नागरिक अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देने के लिए प्रधानसेनापति अशोकराज सिग्देल को निर्देश देने की सिफारिश की है।

24 भदौ की घटना के बारे में आयोग ने कहा कि यह केवल आक्रोशित लोगों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि पूरे देश में एक ही उद्देश्य के साथ पहले से योजना बनाकर संगठित रूप से की गई आपराधिक गतिविधि थी। आयोग ने कहा कि उस दिन की अधिकांश घटनाओं को आपराधिक गतिविधि के रूप में देखा जाना चाहिए।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि 23 भदौ की घटना के मुख्य कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली थे। आयोग के अनुसार, ओली सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध के कारण आंदोलन शुरू हुआ और बाद में पूरे देश में उत्पन्न हालात के लिए ओली मुख्य रूप से जिम्मेदार रहे। आयोग ने कहा कि ओली ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और सुरक्षा स्थिति बिगड़ने के बावजूद सेना की सहायता लेने का निर्णय नहीं लिया।

आयोग ने नेपाली सेना की भूमिका पर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट में कहा गया कि हिंसक प्रदर्शन नियंत्रण से बाहर होने के बाद काठमांडू के प्रमुख जिला अधिकारी ने सेना से सहयोग मांगा था, लेकिन व्यवहार में सेना ने प्रभावी सहयोग नहीं किया। आयोग ने यह भी कहा कि यदि सेना समय पर सक्रिय होती तो देशभर में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और आगजनी को रोका जा सकता था।

आयोग ने आगे यह भी सिफारिश की कि भविष्य में आंतरिक संघर्ष और हिंसक आंदोलनों के दौरान सेना के उपयोग के लिए स्पष्ट कानूनी और नीतिगत व्यवस्था बनाई जाए।

मानवाधिकार आयोग ने जेन–जी आंदोलन के बाद की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की, जांच आयोग के अध्यक्ष गौरीबहादुर कार्की और पूर्व गृहमंत्री ओमप्रकाश अर्याल के खिलाफ भी जांच की सिफारिश की है। आयोग का कहना है कि उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों ने प्रदर्शन को भड़काने में भूमिका निभाई हो सकती है।

आयोग ने रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने सहित 17 सांसदों के खिलाफ भी जांच की सिफारिश की है। आयोग के अनुसार, 24 भदौ की घटना के दौरान नक्खु जेल में बंद रवि लामिछाने को रास्वपा नेताओं और समर्थकों की भीड़ ने घेर लिया था, जिसके बाद सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उन्हें जेल से बाहर निकाला गया। आयोग ने कहा कि इसके बाद अन्य कैदी भी जेल तोड़कर बाहर निकले। आयोग ने इस घटना में लामिछाने और जेल प्रशासक सत्यराज जोशी की भूमिका की जांच की अनुशंसा की है।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस के बीच समन्वय और सूचना आदान–प्रदान में गंभीर कमी थी। आयोग ने इन संस्थाओं को मजबूत बनाने और भीड़ नियंत्रण के लिए मानवाधिकार–अनुकूल प्रशिक्षण देने की सिफारिश की है।

आयोग की रिपोर्ट राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस रिपोर्ट के आधार पर नेपाल सरकार से जवाब मांगा जा सकता है। आयोग अधिनियम के अनुसार सरकार को आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं और मानवाधिकारकर्मियों ने रिपोर्ट को महत्वपूर्ण बताया है, हालांकि कुछ ने इसकी सिफारिशों को अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट कहकर आलोचना भी की है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से लागू करना चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है।

Popular posts from this blog

दो मासूम बच्चे लापता, तलाश में जुटे परिजन – सुराग देने वाले को ₹10,000 का नकद इनाम

बुशरा खान ने इंटरमीडिएट में 95.2% अंक हासिल कर बढ़ाया क्षेत्र और जिले का मान

मदरसों के मुद्दों पर जिला शिक्षा कार्यालय में अहम बैठक, शिक्षा अधिकारी का सम्मान