न्याय की कसौटी और 'सत्याग्रह' का संवैधानिक मौन**
**दिनांक: 29 अप्रैल, 2026**
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 27 अप्रैल 2026 की तारीख एक असामान्य मोड़ के रूप में दर्ज की जाएगी। दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा द्वारा 20 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल की recusal याचिका को 115 पृष्ठों के विस्तृत आदेश में खारिज किए जाने के बाद, केजरीवाल ने 27 अप्रैल को पत्र लिखकर खुद को और अपने वकीलों को उस बेंच की आगे की कार्यवाही से पूरी तरह अलग कर लिया। उन्होंने इसे **गांधीवादी सत्याग्रह** का रूप दिया। यह घटना महज एक आरोपी का कानूनी रणनीतिक कदम नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की नैतिक साख और 'निष्पक्षता के आभास' के सामने खड़ा किया गया एक गंभीर मौन प्रश्न है।
*प्रक्रिया बनाम न्याय: जब रास्ता ही बाधा बन जाए*
मूल प्रश्न यह है कि क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल और कठोर हो गई है कि वह स्वयं में एक दंड का रूप ले चुकी है? न्यायमूर्ति शर्मा का आदेश कानूनी दृष्टि से ठोस और विस्तृत हो सकता है, लेकिन न्याय केवल कानूनी बारीकियों या आदेश की मोटाई से नहीं मापा जाता। जब एक पूर्व मुख्यमंत्री और निर्वाचित जनप्रतिनिधि यह महसूस करने लगें कि अदालत में उनकी दलीलों के लिए निष्पक्ष स्थान सिकुड़ गया है, तो आम नागरिक की स्थिति की कल्पना करना और भी चिंताजनक है।
बहिष्कार का संदेश स्पष्ट और दुर्लभ है — “न मैं पेश होऊंगा, न मेरा वकील।” यह 'reasonable apprehension of bias' पर आधारित है, जिसे न्यायशास्त्र में 'निष्पक्षता का आभास' कहा जाता है। एक तरफ छोटे-मोटे मुकदमों में सालों तक जेल काटता आम आदमी है, दूसरी तरफ हाई-प्रोफाइल मामलों में प्रक्रिया की तेजी या धीमी गति को लेकर उठने वाले संदेह हैं। यही दोहरी धारणा न्यायिक समानता के सिद्धांत को चुनौती दे रही है।
*Recusal की नैतिक सीमाएँ*
Recusal केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि **Bangalore Principles of Judicial Conduct** का नैतिक मूल है, जो जोर देता है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि वह **होते हुए दिखना** भी चाहिए। जब कोई पक्षकार गंभीर संदेह व्यक्त करता है, तो न्यायाधीश का पद पर बने रहना कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन क्या वह संस्थागत विश्वास को मजबूत करता है?
न्यायमूर्ति शर्मा ने recusal याचिका को खारिज करते हुए कहा कि राजनीतिक नेता न्यायाधीश की योग्यता का फैसला नहीं कर सकते और unfounded apprehension से संस्था पर हमला नहीं किया जा सकता। यह तर्क संस्था की गरिमा की रक्षा करता है। फिर भी, नैतिक रूप से सवाल उठता है — जब जनता के एक बड़े वर्ग में निष्पक्षता का आभास कमजोर पड़ रहा हो, तो क्या न्यायपालिका को स्वेच्छा से और ऊंचे नैतिक मानक अपनाने की जरूरत नहीं है?
*गांधीवादी 'सत्याग्रह' की नई परिभाषा*
केजरीवाल ने अपने कदम को गांधीजी के चंपारण और नमक सत्याग्रह की परंपरा से जोड़ा है। जब कानूनी प्रक्रिया 'अन्यायपूर्ण' या 'एकतरफा' लगने लगे, तो सविनय अवज्ञा और अहिंसक प्रतिरोध को नैतिक हथियार मानना गांधीवादी राजनीति का हिस्सा रहा है।
आपातकाल के अंधेरे दिनों में **न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना** ने अकेले साहस दिखाते हुए बहुमत के खिलाफ dissent दिया और अपनी Chief Justice बनने की संभावना गंवा दी। आज केजरीवाल का यह कदम भी अदालत को एक चुनौतीपूर्ण स्थिति में ला खड़ा करता है — जहां आरोपी स्वेच्छा से अपना बचाव का अधिकार (वकील के माध्यम से सुनवाई का हक) त्याग रहा है। यह न्यायिक प्रक्रिया को अधूरी और एकतरफा बनाने का जोखिम उठाते हुए नैतिक दबाव बनाने की रणनीति है।
*आम आदमी का टूटता भरोसा*
इस पूरे संग्राम में सबसे बड़ी क्षति उस आम आदमी के विश्वास की हो रही है, जो अदालत को अन्याय के खिलाफ अंतिम आश्रय मानता है। यदि हाई-प्रोफाइल मामलों में भी प्रक्रिया पर संदेह की छाया बनी रही, तो न्यायपालिका की लोक-प्रामाणिकता कमजोर पड़ेगी। जनता की अदालत और कानून की अदालत के बीच बढ़ती दूरी लोकतंत्र के लिए चेतावनी का संकेत है।
*निष्कर्ष: साख की रक्षा का उत्तरदायित्व*
न्यायपालिका की असली शक्ति न तो पुलिस में है, न सेना में — वह जनता के उस अदृश्य लेकिन अटूट विश्वास में है जो उसे सर्वोच्च बनाता है। केजरीवाल का यह 'सत्याग्रह' न्यायपालिका के लिए आत्ममंथन का महत्वपूर्ण क्षण है। अदालतों को न केवल कानून की रक्षा करनी है, बल्कि उस भरोसे की भी रक्षा करनी है जिसे एक साधारण नागरिक कचहरी की सीढ़ियों पर लेकर आता है।
यदि अहंकार का बोझ न्याय की तराजू को झुकाने लगे, तो सत्याग्रह की ज्योति जलना स्वाभाविक है। न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी तटस्थता का प्रतीक है, अंधेपन का नहीं। यदि वह पट्टी केवल एक पक्ष को देखने के लिए सरकती हुई प्रतीत होने लगे, तो मौन विरोध भी सबसे मुखर आवाज बन सकता है।
संस्थागत परिपक्वता और नैतिक नेतृत्व का समय अब आ गया है।
पूर्व जज व पूर्व लोक सभा प्रत्याशी मनोज कुमार