लखनऊ में “जंग-ए-आज़ादी में उर्दू भाषा और साहित्य की भूमिका” पर सेमिनार आयोजित

लखनऊ, 21 दिसंबर।
ग्लोरियस फ़ाउंडेशन ट्रस्ट के तत्वावधान में तथा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सहयोग से नेहरू युवा केंद्र, चौक में “जंग-ए-आज़ादी में उर्दू भाषा और साहित्य की भूमिका” विषय पर एक विचारोत्तेजक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अहमद इब्राहीम अलवी ने की।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में अहमद इब्राहीम अलवी ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू भाषा और साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उर्दू के अनेक साहित्यकारों और कवियों ने देश की आज़ादी के लिए कुर्बानियाँ दीं और अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों का सामना किया। उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा की इन कुर्बानियों को भुलाया नहीं जा सकता।
सेमिनार में विशिष्ट अतिथि के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैयर, ज़िला उद्योग के सहायक आयुक्त वी.डी. चौधरी तथा वरिष्ठ पत्रकार उबैदुल्लाह नासिर उपस्थित रहे। प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैयर ने कहा कि उर्दू भाषा और साहित्य का इतिहास अत्यंत समृद्ध है। उर्दू के नारों और रचनाओं ने लोगों के दिलों में जोश और उत्साह भरने का कार्य किया और आज़ादी की लड़ाई को मजबूती दी। वहीं वरिष्ठ पत्रकार उबैदुल्लाह नासिर ने कहा कि उर्दू पत्रकारिता ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई और समाज में जागरूकता का वातावरण तैयार किया।
कार्यक्रम का संचालन मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, लखनऊ कैंपस के डॉ. मसीहुद्दीन ख़ान ने किया। उन्होंने सेमिनार के सफल आयोजन के लिए संयोजक नज़हत शहाब चिश्ती को बधाई दी। कार्यक्रम की संयोजक नज़हत शहाब चिश्ती और मोहम्मद काशिफ़ ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्हें शॉल और मोमेंटो भेंट किए।
सेमिनार में प्रोफेसर रेशमां परवीन, डॉ. इहतिशाम अहमद ख़ान, परवेज़ मलिकज़ादा, डॉ. नज़हत फ़ातिमा सहित अनेक विद्वानों ने भाग लिया। वक्ताओं ने कहा कि 1857 के बाद उर्दू साहित्य ने नए सिरे से विकास की शुरुआत की। उस दौर में अंग्रेज़ों द्वारा साहित्यकारों पर पाबंदियाँ और अत्याचार किए गए, लेकिन इसके बावजूद प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने अपनी कलम नहीं रोकी। इस अवसर पर जोश मलीहाबादी, चकबस्त, मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना हसरत मोहानी जैसे महान व्यक्तित्वों के योगदान को विशेष रूप से याद किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत तिलावत-ए-क़ुरआन से हुई। सेमिनार में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से आए विद्वानों तथा शहर के प्रमुख साहित्यकारों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इनमें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सुपरिंटेंडेंट मुमताज़ अहमद, अशरफ़ फ़िरदौसी, पत्रकार ग़ुफ़रान नसीम, मोहम्मद राशिद ख़ान, ज़ियाुल्लाह सिद्दीकी सहित कई नाम शामिल रहे।
इसके अतिरिक्त अकील फ़ारूक़ी, मसीहुद्दीन ख़ान, नैर उमर, नदीम अहमद, सहर टीवी के सरवर हुसैन, अतहर काज़मी, हारिस इब्राहीम अलवी, सैफ़ी आदि ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की। शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले वक्ताओं ने कहा कि उर्दू भाषा के बिना आज़ादी की कल्पना अधूरी है।
— नज़हत शहाब चिश्ती
सेमिनार संयोजक

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