एस.आर.एन. चिकित्सालय का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की मांग तेजअमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का प्रवेश शुल्क समाप्त करने की भी उठी मांग
सद्दाम खान
बस्ती/प्रयागराज।
महुआ डाबर संग्रहालय, बस्ती द्वारा अमर शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस 17 दिसंबर से अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान दिवस 19 दिसंबर तक ‘शहादत से शहादत तक’ शीर्षक से आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ गोरखपुर कारागार से किया गया।
कार्यक्रम के द्वितीय दिवस 18 दिसंबर 2025 को अपराह्न 3 बजे, अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान स्थल (पूर्व मलाका जेल परिसर), एस.आर.एन. हॉस्पिटल, प्रयागराज में विचार–विमर्श सत्र आयोजित हुआ। इसके पश्चात अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क तक मशाल जुलूस निकालकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मशाल सलामी क्रांतिकारी वंशज उत्तम कुमार बनर्जी के नेतृत्व में संपन्न हुई।
विचार–विमर्श सत्र में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विद्वान एवं महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राणा, विचारक अविनाश गुप्ता, गौतम कुमार बनर्जी एडवोकेट, विजेंद्र अग्रहरी, संजू चौधरी, सुनील यादव एडवोकेट, विजय मजूमदार एडवोकेट, सुदर्शनाचार्य जी महाराज (दो), बबीता एडवोकेट, डॉ. प्रमोद शुक्ला, संतोष सिंह एडवोकेट, ओमप्रकाश शुक्ला, सपना एडवोकेट, पवन शंकर श्रीवास्तव, असीम मुखर्जी, रवि मोदक सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने तीखे शब्दों में कहा कि जिस प्रयागराज की धरती पर आज़ादी के महानायकों ने बलिदान दिया, वहीं आज शहादत स्थलों पर प्रवेश शुल्क वसूला जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने विशेष रूप से अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में छोटे स्कूली बच्चों से भी प्रवेश शुल्क लिए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। वक्ताओं ने कहा कि यदि सरकार पूरे पार्क के रखरखाव के लिए टिकट व्यवस्था करना चाहती है तो कर सकती है, लेकिन शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, प्रांगण और शहादत स्थल तक पहुंच पर शुल्क लेना सरासर अनुचित है।
ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज़ाद की शहादत के बाद जिस जामुन के पेड़ के पास उन्होंने स्वयं को बलिदान किया था, उसकी पूजा शुरू हो गई थी। अंग्रेजी हुकूमत ने प्रेरणा के प्रसार को रोकने के लिए पहले पेड़ को कटवाया और फिर उसकी जड़ों तक को जलवा दिया, परंतु वह आज़ाद की चेतना को समाप्त नहीं कर सकी। आज स्वतंत्र भारत में शुल्क लगाकर कहीं वही इतिहास दोहराया तो नहीं जा रहा—यह गंभीर प्रश्न है।
वक्ताओं ने कहा कि आज़ाद की शहादत स्थल पर वर्षों से मेले लगते रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि शुल्क लगाकर उन मेलों, स्मृतियों और नई पीढ़ी के जुड़ाव को रोका जा रहा हो? क्या अब शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए भी शुल्क देना पड़ेगा?
ठाकुर रोशन सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनका नाम ही नहीं, उनके विचार भी नई पीढ़ी को रोशन करने वाले हैं। फांसी से पूर्व मलाका जेल में लिखे गए उनके पत्र आज भी महुआ डाबर संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो उनके विचारों की जीवंत साक्षी हैं। 19 दिसंबर 1927 को उनकी शहादत के दिन हजारों लोग उनका पार्थिव शरीर लेने जेल के बाहर एकत्र हुए थे, जिनके ऐतिहासिक चित्र आज भी जनभावना की गवाही देते हैं।
वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि जिस मलाका जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी, वही स्थल आज एस.आर.एन. मेडिकल कॉलेज परिसर में समाहित है। ऐसे में आज़ादी के अमृत काल में एस.आर.एन. चिकित्सालय का नामकरण अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाना शहादत का सच्चा सम्मान होगा। साथ ही, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का प्रवेश शुल्क तत्काल समाप्त करने की मांग भी सर्वसम्मति से उठाई गई।