बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर6 दिसंबर 1956, महापरिनिर्वाण दिवस

सद्दाम खान

दिल्ली की रात के बारह बजे, अचानक फोन की घंटियाँ बज उठीं। देश के सभी बड़े शहर शांत थे, लेकिन दिलों में तूफ़ान था। एक महान नेता हमसे अलग हो गया था, जिसके जाने से करोड़ों लोग रोने लगे।
मुंबई की सड़कों, ट्रेनों, बसों—हर जगह लोगों का सैलाब था, जो बाबा के अंतिम दर्शन के लिए आ रहे थे। बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ सभी एक साथ कह रहे थे:
"हमारे पिताजी चले गए!"
चिता जल रही थी, अरब सागर किनारे किनारे उसके साथ थरथरा रहा था। यह वही आग थी जो समानता, स्वतंत्रता, न्याय और मानवता की रोशनी फैला रही थी।
बाबा ने अपने कलम से संविधान बनाया, हर नागरिक को अधिकार दिए, महिलाओं और मजदूरों को न्याय की रोशनी दी।
नागपुर की दीक्षाभूमि मातम में डूबी हुई थी, तीन लाख महिलाओं ने बाबा के अंतिम दर्शन में भाग लिया।
बाबा साहेब ने आधुनिक भारत को नया चेतना, नया साहस और मानवता की रोशनी दी।

अब वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बुद्धि और किरणें हमेशा हमारे दिलों और समाज को रोशन करेंगी।
हम हाथों में हाथ डालकर आगे बढ़ेंगे, उस रास्ते पर जहाँ कभी सूर्यास्त नहीं होगा।

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