ईदुल अज़हा पर दुधवनिया बुज़ुर्ग में नमाज़ अदा की गई, मौलाना रियाज़ी ने बताया पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के आखिरी संदेश को पुरी इनसानियत के लिए आम करने की जरूरत है त्याग, तौहीद और इंसाफ़ का बना आलमी पैग़ाम
ईदुल अज़हा पर दुधवनिया बुज़ुर्ग में नमाज़ अदा की गई, मौलाना रियाज़ी ने पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के आखिरी संदेश को पुरी इनसानियत के लिए आम करने की जरूरत है
बढ़नी, सिद्धार्थनगर –
ग्राम पंचायत दुधवनिया बुज़ुर्ग की ईदगाह में ईद-उल-अज़हा (बकरीद) का पर्व हर्षोल्लास और रूहानियत के साथ मनाया गया। बड़ी संख्या में नमाज़ियों ने एकजुट होकर ईद की नमाज़ अदा की और आपसी मोहब्बत, भाईचारे और अमन के लिए दुआ की।
इस पाक मौके पर प्रसिद्ध इस्लामी चिंतक मौलाना मसीहुद्दीन रियाज़ी ने पूरे मुस्लिम समाज को मुबारकबाद दी और एक प्रेरणादायक संदेश जारी किया। उन्होंने बकरीद को केवल जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि नफ़्स, लालच, घमंड और दुनियावी इच्छाओं की कुर्बानी का दिन बताया।
> "हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत इस्माईल (अ.स.) ने जो अल्लाह की राह में इख़लास और फ़रमाबरदारी दिखाई, वही हमारे लिए असली पैग़ाम है। हमें चाहिए कि आज के दौर में फैलती नफ़रत और फितना से बचकर, अपने अंदर परहेज़गारी, सब्र और सच्चाई को पैदा करें।"
मौलाना ने कहा कि अगर हम कुर्बानी की असल रूह को समझ लें तो समाज में नैतिकता, न्याय और इंसानियत की बहाली संभव है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का आख़िरी पैग़ाम भी रहा प्रेरणा का केंद्र
ईदगाह में मौलाना मसीहुद्दीन रियाज़ी ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विदाई हज (हज्जतुल विदा) के ऐतिहासिक ख़ुत्बे (उपदेश) को भी याद किया, जिसमें इंसानियत के लिए एक सार्वभौमिक संदेश दिया गया था।
इस ख़ुत्बे के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:
मानव समानता: “किसी अरबी को अजमी पर और किसी गोरे को काले पर कोई श्रेष्ठता नहीं — सिवाय तक़वा के।”
औरतों के अधिकार: “उनके साथ भलाई और इंसाफ़ से पेश आओ।”
ख़ून-खराबा व सूद की समाप्ति, अमानतदारी और ज़िम्मेदारी, क़ुरआन और सुन्नत की पाबंदी, और मज़हबी भाईचारा – ये सभी इंसानी समाज को एक आदर्श दिशा में ले जाने की शिक्षाएं थीं।
अंत में उठीं दुआ की आवाज़ें...
मौलाना रियाज़ी ने अल्लाह से दुआ की:
> “हमारी कुर्बानियों को कुबूल फरमा, हमारे दिलों को तौहीद, इख़लास और इंसाफ़ से रोशन कर, और हमें सच्चा मोमिन बना दे।”
संदेश:
इस ईदुल अज़हा पर दुधवनिया बुज़ुर्ग की ईदगाह से जो संदेश निकला, वह कुर्बानी, इंसाफ़, समानता और रूहानियत का आलमी पैग़ाम बन गया — जो आज की इंसानियत को एक नई दिशा देने की ताक़त रखता है।
सैकड़ों लोगों ने एकसाथ नमाज अदा की प्रोफ़ेसर मुहम्मद उमर फारूक, मुश्ताक अहमद, मास्टर शमशुद्दीन, डॉ इज़हरुल हक़, मास्टर इस्तेखार अहमद, सईद आलम, मास्टर मुस्तनसेरुल्लाह, अल्हाज सैफुद्दीन, तुफैल अहमद, सईद आलम, इंजीनियर जियाउलहक, अबुलहसन, मास्टर जकाउल्लाह, एडवोकेट मसरूर आलम, एडवोकेट मसीउल्लाह, इंजीनियर जुनैद अहमद, इंजीनियर एजाजुर्रहमान, सईदुर्रहमान, तमाम सम्मानित अकीदत मंद ने साथ नमाज पढ़ी