नेपाल के शाही परिवार के पुण्यतिथि के अवसर पर खास रिपोर्ट

गुरु जी की कलमसे 
नारायणीहिटी दरबार हत्याकांड : नेपाली इतिहास की सबसे दर्दनाक रात

बढ़नी सिद्धार्थनगर आज के ही दिन 
विक्रम संवत 2058 की जेठ 19 की वह शाम नेपाली इतिहास की सबसे भयावह और दुखद रात बन गई। नारायणीहिटी राजमहल में शाही परिवार एक पारिवारिक भोज में एकत्रित हुआ था। यह एक प्रेम, स्नेह और सामूहिकता से भरी शाम होनी थी लेकिन चंद ही पलों में यह दृश्य एक रक्तरंजित त्रासदी में बदल गया।
उसी रात नेपाल के लोकप्रिय और जनप्रिय राजा बीरेन्द्र शाह, रानी ऐश्वर्या, राजकुमार निरंजन, राजकुमारी श्रुति और स्वयं युवराज दीपेन्द्र गोलीबारी का शिकार हो गए। केवल इतना ही नहीं राजा के छोटे भाई धीरेंद्र, राजकुमारी जयंती, शांति, शारदा और शारदा के पति कुमार खड़ग विक्रम शाह भी इस बर्बरता का शिकार बने।
एक ही रात में पूरे शाही परिवार का दीप बुझ गया और नेपाल की सदियों पुरानी राजशाही की नींव हिल गई।
युवराज दीपेन्द्र जो इस घटना में गंभीर रूप से घायल थे अगले दिन जेठ 20 को अस्पताल के बिस्तर पर ही राजा घोषित कर दिए गए और राजकुमार ज्ञानेन्द्र को कार्यवाहक राजा बनाया गया। जेठ 22 को दीपेन्द्र की मृत्यु की घोषणा हुई और ज्ञानेन्द्र शाह औपचारिक रूप से गद्दी पर बैठे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केशव प्रसाद उपाध्याय और संसद अध्यक्ष तारानाथ रानाभाट की दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई गई। समिति की रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया गया कि युवराज दीपेन्द्र ने नशे की हालत में अपने परिवार की हत्या की और अंत में खुद को भी गोली मार ली। रिपोर्ट में बताया गया कि उन्हें अपनी प्रेमिका से विवाह की अनुमति न मिलने का मानसिक आघात था जिसने उन्हें यह घातक कदम उठाने पर मजबूर किया।
हालांकि यह सरकारी रिपोर्ट जनता के दिलों को संतुष्ट नहीं कर सकी। आज भी लाखों नेपाली इस आधिकारिक बयान को शंका की दृष्टि से देखते हैं।
लोग आज भी सवाल करते हैं
क्या इतना बड़ा हत्याकांड उच्च सुरक्षा वाले महल में केवल एक व्यक्ति कर सकता है
क्या किसी ने जानबूझकर आंखें मूंद ली थीं
क्या सच्चाई कभी सामने आएगी
यह सवाल आज भी धुंध में लिपटे हुए हैं और नारायणीहिटी दरबार जो कभी नेपाली गौरव और शाही वैभव का प्रतीक था आज एक संग्रहालय बन चुका है जो अतीत की सिसकियों को अपने भीतर समेटे हुए है।
इस रक्तरंजित तूफ़ान के बाद नेपाली राजशाही की नींव डगमगा गई। ज्ञानेन्द्र शाह यद्यपि राजा बने परंतु वे जनविश्वास अर्जित करने में विफल रहे। विक्रम संवत 2059 से 2063 तक जनजागरण लोकतांत्रिक आंदोलनों और राजनीतिक संघर्षों की एक लहर उठी जिसने राजशाही की जड़ों को हिला दिया।
आखिरकार 2063 में बहाल संसद ने राजा के सभी अधिकार छीन लिए और 2065 में नेपाल ने स्वयं को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर शाही युग का अंतिम अध्याय बंद कर दिया।
यह हत्याकांड केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं था बल्कि यह एक राजनीतिक ऐतिहासिक और सामाजिक भूकंप था जिसकी गूंज आज भी नेपाली जनमानस में महसूस की जाती है।
माओवादी केन्द्र लुंबिनी प्रदेश समिति के सदस्य मौलाना मशहूद खान नेपाली का बयान
यह केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं बल्कि आज भी जलता हुआ जख्म है। नारायणीहिटी हत्याकांड को दो दशक से अधिक हो गए लेकिन आज तक असली कातिल कौन थे यह राष्ट्र की जनता के लिए एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है। यह न्याय व्यवस्था और शासन प्रणाली दोनों के लिए गंभीर आत्मचिंतन का विषय है।
हमारी स्पष्ट मांग है कि इस रहस्य पर और परदा न डाला जाए। सच्चाई को सामने लाया जाए और जिन हाथों ने उस रात राजमहल को खून से रंगा उन्हें न्याय के कठघरे में लाया जाए।
यदि नेपाल को सच्चे लोकतंत्र और न्याय की बुनियाद पर खड़ा करना है तो नारायणीहिटी हत्याकांड जैसे अध्यायों की पूर्ण सच्चाई उजागर करना अनिवार्य है। अब यह रहस्य नहीं एक खुला सच बनना चाहिए।

Popular posts from this blog

दो मासूम बच्चे लापता, तलाश में जुटे परिजन – सुराग देने वाले को ₹10,000 का नकद इनाम

बुशरा खान ने इंटरमीडिएट में 95.2% अंक हासिल कर बढ़ाया क्षेत्र और जिले का मान

मदरसों के मुद्दों पर जिला शिक्षा कार्यालय में अहम बैठक, शिक्षा अधिकारी का सम्मान