मान्यता है कि संत कबीर का जन्म 1455 संवत, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था इस साल यह तिथि आज 11 जून 2025 को पड़ रही है समाज सुधारक संत कबीर की जयंती हर साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है
मान्यता है कि संत कबीर का जन्म 1455 संवत, ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था इस साल यह तिथि आज 11 जून 2025 को पड़ रही है समाज सुधारक संत कबीर की जयंती हर साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है
गुरु जी की कलम से
बढनी सिद्धार्थनगर
कबीर एक महान समाज सुधारक और संत थे जिन्होंने धर्म और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे जातिवाद, धर्मवाद और अंधविश्वास के खिलाफ थे और उन्होंने सभी मनुष्यों की समानता और सार्वभौमिक भाईचारे पर जोर दिया था
कबीर ने विभिन्न धर्मों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की और सभी धर्मों के लोगों को एक ही ईश्वर की संतान बताया ह
उन्होंने भक्ति मार्ग पर जोर दिया, जो सभी के लिए खुला था, और उन्होंने ईश्वर से व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने पर जोर दिया।
कबीर ने धार्मिक अनुष्ठानों, कर्मकांडों और पाखंडी व्यवहारों की आलोचना किया है।
उन्होंने सत्य, प्रेम, और सदाचार जैसे नैतिक मूल्यों पर जोर दिया।
कबीर ने अहिंसा, क्षमा, और दूसरों के प्रति दयालुता पर जोर दिया है 
उन्होंने जातिगत भेदभाव को खारिज किया और कहा कि जन्म से कोई ऊँचा नहीं होता, बल्कि अच्छे कर्मों से। ही व्यक्ति ऊंचा बनता ह
उन्होंने सामाजिक बुराइयों जैसे छुआछूत, अंधविश्वास, और दिखावा के खिलाफ आवाज उठाई
कबीर ने सभी मनुष्यों की समानता और न्याय के अधिकार पर जोर दिया।
उन्होंने मानवता, प्रेम और भाईचारे पर जोर दिया है
कबीर ने अपनी शिक्षाओं को साधारण भाषा में दिया, ताकि वे सभी लोग कबीर के विचारो को समझकर उसे आत्मसात कर सकें
कबीर कुछ दोहे एसे हैं जो हमको समाज की वास्तविकता से हमें अवगत कराते हैं:
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ: मैं बुराई खोजने चला, लेकिन मुझे कोई बुराई नहीं मिली। जब मैंने अपने मन में झाँका, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ: संत की जाति मत पूछो, बल्कि उसके ज्ञान को पूछो। तलवार का मूल्य होता है, म्यान का नहीं।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ: बहुत से लोग किताबें पढ़-पढ़कर मर जाते हैं, लेकिन कोई पंडित नहीं बनता। जो ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ लेता है, वही पंडित होता है।
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो बताए।
अर्थ: गुरु और गोविंद दोनों खड़े हैं, मैं किसके चरण स्पर्श करूँ? मैं गुरु के चरणों में बलिहारी हूँ, क्योंकि गोविंद ने मुझे रास्ता दिखाया।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।
अर्थ: ऊँचाई पाने के बाद भी क्या फायदा, जैसे खजूर का पेड़? पक्षी को छाया नहीं मिलती, और फल भी बहुत दूर होते हैं।