शहीद अशफाक उल्ला खां की मजार की मिट्टी पहुंची महुआ डाबर, क्रांतिवीरों की स्मृतियों को सहेजने की ऐतिहासिक पहल
बस्ती।
देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओतप्रोत बस्ती जनपद का महुआ डाबर गांव एक बार फिर इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है। शुक्रवार को यहां के क्रांति संग्रहालय में अमर शहीद अशफाक उल्ला खां की मजार की मिट्टी श्रद्धा के साथ स्थापित की गई। यह पावन मिट्टी शाहजहांपुर से लाई गई थी, जहां अशफाक उल्ला खां की मजार स्थित है। मिट्टी की 'गुलपोशी' के साथ जैसे ही उसे संग्रहालय में स्थान दिया गया, वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं और माहौल 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'अशफाक अमर रहें' के नारों से गूंज उठा।
इस ऐतिहासिक अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण, स्कूली छात्र, शिक्षाविद, समाजसेवी और पत्रकार उपस्थित रहे। महुआ डाबर क्रांति संग्रहालय के निदेशक और प्रख्यात दस्तावेजी लेखक डॉ. शाह आलम राना ने इस पहल को आजादी के अमर सपूतों की स्मृति को जीवंत रखने की दिशा में एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा, “यह मिट्टी केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम के उन बलिदानों की जीवंत स्मृति है, जिनके कारण हम आज आज़ाद हैं। हमारी नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि यह आज़ादी कितनी बड़ी कीमत चुकाकर मिली है।”
महुआ डाबर गांव का अपना भी एक गौरवशाली इतिहास है। 1857 की पहली स्वतंत्रता क्रांति में यह गांव अंग्रेजों के खिलाफ संगठित विद्रोह का केंद्र बना, जहां हजारों लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। लेकिन आज़ाद भारत में यह गांव आज भी उचित सरकारी मान्यता और स्मारक से वंचित है।
इसी पृष्ठभूमि में संग्रहालय द्वारा ‘बलिदान-स्मृति स्तंभ’ निर्माण की कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके तहत देश के प्रमुख क्रांतिकारी स्थलों की मिट्टी एकत्र कर महुआ डाबर की ‘गैर-चिरागी’ (अनसंग) मिट्टी से मिलाकर एक राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण किया जाएगा। यह स्मारक ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का जीता-जागता प्रतीक होगा।
अशफाक उल्ला खां की मिट्टी इस अभियान की पहली कड़ी बनी है। गौरतलब है कि वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सेनानायक थे और काकोरी कांड के प्रमुख सूत्रधारों में से एक। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए हंसते-हंसते फांसी को गले लगाया। महुआ डाबर संग्रहालय में वर्ष 2011 से उनकी जेल डायरी, पत्र और दुर्लभ दस्तावेज संरक्षित हैं, जिनकी देशभर में प्रदर्शनी लगाई जाती रही है।
समारोह के अंत में डॉ. राना ने सभी नागरिकों, संस्थाओं और प्रशासन से अपील की कि वे इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाएं। उन्होंने कहा कि यह पहल केवल एक संग्रहालय की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की पुनर्स्थापना का प्रयास है।
इस अवसर पर नूर मोहम्मद प्रधान, रमजान खान, फकीर मोहम्मद, इब्राहिम शेख, नासिर खान (विधायक प्रतिनिधि), मुमताज खान, धर्मेंद्र, विजय प्रकाश बीडीसी, सतीश गौतम, कीर्ति कुमार, यशवंत, बाबूराम, मास्टर फिरोज, महसर अली, नबी आलम खान सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
रिपोर्ट: सद्दाम हुसैन