बौद्ध पूर्णिमा पर खास रिपोर्ट दुनिया अपना रही युद्ध नहीं बुद्ध की राह
परमात्मा उपाध्याय
कॉलिंग युद्ध (आधुनिक ओडिसा) में भारी नुकसान और रक्तपात के बाद, सम्राट अशोक को युद्ध की विनाशकारिता का एहसास हुआ। इस युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त के कहने और समझाने पर बौद्ध धर्म अपना लिया था।
बुद्ध ने ज्ञान को नवीन ढंग से परिभाषित करते हुए समाज के निचले वर्ग सहित समस्त मानव जाति के लिए एक नवीन मार्ग के पथ को प्रशस्त किया।
बुद्ध ने समाज के अंत्यंत, शोषित और उत्पीड़ित वर्ग के लिए एक मानव धर्म की परिकल्पना की थी, जिसे उनके अनुयायियों ने बौद्घ धर्म का नाम दिया था। मानव धर्म जिसमें सर्वहारा की शक्ति ने आंदोलन का स्वरूप ग्रहण किया। बुद्ध को उत्पीड़ित जातियों की एकता और शक्ति का भान था। समाज के अंत्यज, शोषित और उत्पीड़ित वर्ग की एकता का बोध उसके दो हाथों को कराते हैं। बुद्ध महामानव इसलिए हैं क्योंकि वे ज्ञान, चेतना, भक्ति, कर्म और दुःख का समन्वय कर सके। जब जब दुनिया युद्ध के राह पर होगी तब तब महात्मा बुद्ध शांति का राह सुझाएंगे।
अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने में बौद्ध भिक्षु उपगुप्त का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
कलिंग युद्ध के बाद जो उनके शासन के आठवें वर्ष में हुआ था,इस युद्ध में हुए नुकसान और नरसंहार ने अशोक के हृदय को बुरी तरहसे झकझोर दिया। सम्राट अशोक युद्ध और हिंसा से ऊब गए थे। इस दुख से उबरने के लिए उन्होंने बुद्ध के उपदेशों का पालन करना शुरू किया और अंततः बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।
बौद्ध धर्म अपनाने के बाद, अशोक ने अपने राज्य में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कई प्रयास किए, जिसमें धर्म प्रचारक भेजना और अपने अभिलेखों में बौद्ध धर्म के संदेशों को उत्कीर्ण करना शामिल रहा। अशोक ने "धम्म" नामक एक नैतिक और धार्मिक नीति शुरू की, जो अहिंसा, न्याय, और सद्गुणों पर आधारित था।
अशोक ने अपने धर्म और नीतियों को अपने राज्य के विभिन्न हिस्सों में शिलालेखों के माध्यम से प्रचारित और प्रसारित कराया था।बौद्ध धर्म अहिंसा सद्गुण, न्याय और दया पर आधारित होने के कारण इसका प्रचार प्रसार विश्व के कई देशों तक हुआ।
भगवान बुद्ध का धर्म वर्तमान में कई राष्ट्रों का धर्म है। जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, कंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, तिब्बत, भूटान, मकाऊ, बर्मा, लागोस और श्रीलंका तो है ही, भारत, नेपाल, मलेशिया, इंडोनेशिया, रशिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, कनाडा, सिंगापुर, फिलीपींस, ब्राजील और अफगानिस्तान में भी बौद्धों की संख्या अच्छी खासी है। हालांकि कुछ वर्षों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बौद्धों पर हुए अत्याचार के चलते वहां इनकी संख्या कम हुई है।
वैशाख पूर्णिमा जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं, यह दिन गौतम बुद्ध के पूरे जीवन में कई बार खुशियों का दिन बन के आया है। महात्मा बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को वैशाख पूर्णिमा के दिन तब हुआ जब उनकी माता महामाया देवी अपने मायके देवदह जा रही थीं।
वैशाख (पूर्णिमा) 528 ईसा पूर्व उन्होंने भारत वर्ष के बिहार प्रांत में बोधगया में एक वृक्ष के नीचे कठिन तपस्या करके जाना कि सत्य क्या है, इसका ज्ञान प्राप्त किया। वैशाख पूर्णिमा के ही दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में कुशीनगर में दुनिया को अलविदा कह गए।
बुद्ध का जन्म का नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे और उनका सम्मान नेपाल ही नहीं समूचे भारत में था। सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी मां महामाया का देहांत हो गया था। इसके बाद सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका पालन पोषण किया
सिद्धार्थ का सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। यशोधरा से उनको एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया
बताया जाता है कि.बुद्ध के जन्म के बाद एक भविष्यवक्ता ने राजा शुद्धोदन से कहा था कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, लेकिन यदि वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया तो इसे सन्यासी होने से कोई नहीं रोक सकता है और इसकी ख्याति समूचे संसार में अनंतकाल तक कायम रहेगी। राजा शुद्धोदन सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनते देखना चाहते थे इसीलिए उन्होंने सिद्धार्थ के आस-पास भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया ताकि किसी भी प्रकार से सिद्धार्थके मन मेवैराग्य भावउत्पन्न न हो सके
बताया जाता है कि एक दिनआधी रात को जब सब लोग गहरी निद्रा में सो रहे थे तो 29 वर्षीय सिद्धार्थ ने अपना महल त्यागकर दूर गोरखपुर के पास आमी नदी के तट पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने अपने राजसी वस्त्र उतारे और केश काटकर कोपीन धरण करखुद को संन्यस्त कर दिया। वह स्थान आज भी कोपिया के नाम से प्रसिद्ध है
कठिन तप के बाद उन्होंने बोधिसत्व प्राप्त की। बोधिसत्व प्राप्ति की घटना ईसा से 528 वर्ष पूर्व वैशाख पूर्णिमाकी है जब सिद्धार्थ 35 वर्ष के थे।
जिस बट वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था वह वटवृक्ष आज भीविद्यमान है जिसे अब बोधीवृक्ष कहा जाता है। जो बिहार प्रांत के बोधगया में स्थित हैसम्राट अशोक इस वृक्ष की एक शाखा श्रीलंका पहुंचाए थे, वहां यह वृक्ष आज भी मौजूद है।
.कुछ लोग कहते हैं कि श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णुपुराण में हमें शाक्यों की वंशावली के बारे में उल्लेख पढ़ने को मिलता है। कहते हैं कि राम के 2 पुत्रों लव और कुश में से कुश का वंश ही आगे चल पाया। कुश के वंश में ही आगे चलकर शल्य हुए, जो कि कुश की 50वीं पीढ़ी में महाभारत काल में उपस्थित थे। इन्हीं शल्य की लगभग 25वीं पीढ़ी में ही गौतम बुद्ध हुए
बुद्ध के धर्म प्रचार से उनके भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो भिक्षुओं के आग्रह पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बौद्ध संघ में बुद्ध ने स्त्रियों को भी साथ रखने की अनुमति दे दी। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगति में संघ के दो हिस्से हो गए। हीनयान और महायान। सम्राट अशोक ने 249 ई.पू. में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन कराया था। उसके बाद भी भरपूर प्रयास किए गए सभी भिक्षुओं को एक ही तरह के बौद्ध संघ के अंतर्गत रखे जाने के किंतु देश और काल के अनुसार इनमें बदलाव आता रहा।
चीन, जापान, श्रीलंका और भारत सहित दुनिया के अनेक बौद्ध राष्ट्रों के बौद्ध मठों में पश्चिमी जगत की तादाद बढ़ी है। सभी अब यह जानने लगे हैं कि पश्चिमी धर्मों में जो बाते हैं वे बौद्ध धर्म से ही ली गई है, क्योंकि बौद्ध धर्म, ईसा मसीह से 500 साल पूर्व पूरे विश्व में फैल चुका था।
दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहां बौद्ध भिक्षुओं के कदम न पड़े हों। दुनिया भर के हर इलाके से खुदाई में भगवान बुद्ध की प्रतिमा निकलती है। दुनिया की सर्वाधिक प्रतिमाओं का रिकॉर्ड भी बुद्ध के नाम दर्ज है। बताया जाता है किबुत परस्ती शब्द की उत्पत्ति ही बुद्ध शब्द से हुई है। बुद्ध के ध्यान और ज्ञान पर बहुत से मुल्कों में शोध जारी है।