मुस्लिम समाज की उपेक्षा पर बिफरा राष्ट्रिय मदरसा संघ नेपाल, बजट 2082 को बताया 'अन्यायपूर्ण और भावनात्मक धोखा'

काठमांडू, 29 मई:
2082 के आर्थिक बजट की घोषणा के साथ ही देशभर के मुस्लिम समाज, धार्मिक मदरसों, उलेमा और छात्रों के बीच गहरी निराशा की लहर दौड़ गई है। बजट में धार्मिक और शैक्षिक संस्थानों के लिए न केवल अत्यंत सीमित राशि रखी गई, बल्कि मुस्लिम समुदाय की आवश्यकताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इसको लेकर राष्ट्रिय मदरसा संघ नेपाल ने सरकार के खिलाफ तीखा विरोध दर्ज कराया है।
संघ के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल गनी अलकूफ़ी ने इस बजट को अल्पसंख्यकों के साथ "भावनात्मक धोखा" करार देते हुए कहा,

> "मात्र तीन लाख रुपए में मदरसों का संचालन असंभव है। यह बजट नहीं, हमारे अस्तित्व और सम्मान पर हमला है। सरकार अल्पसंख्यक समुदाय की संस्थाओं को केवल दिखावटी घोषणाओं तक सीमित रख रही है।"



उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिया जा सकता है, तो समाज के नैतिक शिक्षक उलेमा-ए-किराम को यह हक़ क्यों नहीं मिल सकता? उन्होंने सरकार से मांग की कि उलेमा को भी सरकारी शिक्षकों की तरह वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए।

संघ के महासचिव मौलाना मशहूद ख़ान नेपाली ने बजट को "हमारे जज़्बातों का जनाज़ा" बताते हुए कहा,

> "मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ ज्ञान नहीं, उम्मीदें पालते हैं। लेकिन बजट में उनके लिए कुछ भी नहीं रखा गया। मुस्लिम आयोग और प्रतिनिधियों की चुप्पी भी बेहद निराशाजनक है।"



उन्होंने सरकार से इंसाफ़ की मांग करते हुए कहा कि:

मदरसों के लिए बजट में बढ़ोतरी की जाए,

उलेमा को सरकारी दर्जा दिया जाए,

मुस्लिम छात्रों के लिए विशेष छात्रवृत्तियाँ, हॉस्टल और विकास योजनाएं चलाई जाएं।


संघ ने देश के सभी न्यायप्रिय संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मुस्लिम नेताओं से अपील की है कि वे इस उपेक्षा के खिलाफ आवाज़ उठाएं और मुस्लिम समुदाय को उसका शैक्षिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार दिलाने में सहयोग करें।

डॉ. अलकूफ़ी ने अंत में दो टूक कहा,

> "जब तक बजट इंसाफ़ की बुनियाद पर नहीं बनेगा, तब तक अल्पसंख्यकों का सरकार पर भरोसा बहाल नहीं हो सकता — और जहां भरोसा नहीं होता, वहां तरक्की महज़ एक धोखा बनकर रह जाती है।

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