1857: अंग्रेजों भारत छोड़ो के बिगुल के बीच नेपाल कर रहा था ब्रिटिश हुकूमत की तरफदारी

परमात्मा उपाध्याय 


10 मई 1857 को को ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध चर्बी वाले कारतूसों का विद्रोह जल्द ही पूरे भारत में फैल गया जो ब्रिटिश शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। 
मंगल पांडे, रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहिब, तात्या टोपे, और बहादुर शाह जफर इस विद्रोह के नायक थे। देश की आजादी में इन वीर जवानों का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
नेपाल जो आज हमारा मित्र राष्ट्र है,वह 1857 की क्रांति में नेपाल ने अंग्रेजों का समर्थन किया था। नेपाल के शासक, जंग बहादुर ने विद्रोहियों को गिरफ्तार करने और अंग्रेजों की मदद करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके बदले में अंग्रेजों ने भारत के नेपालगंज और कपिलवस्तु का तराई हिस्सा नेपाल को दे दिया था। यह हिस्सा 1816 के सुगौली संधि में अग्रेजों को मिला हुआ था।
1816 की सुगौली संधि के बाद, नेपाल और अंग्रेजों के बीच एक मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गया था। नेपाल के शासक अंग्रेजों को अपने पड़ोसी और सहयोगी के रूप में देखते थे।नेपाल में उस समय राणा शासन था, जो अंग्रेजों के प्रति बहुत वफादार था। राणा शासकों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर नेपाल को बाहरी प्रभावों से बचाने की कोशिश की। नेपाल के शासक 1857 के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपने लिए एक गंभीर खतरा मानते थे। नेपाल के शासक नहीं चाहते थे कि विद्रोह नेपाल में फैल जाए और उनकी सत्ता को भी खतरे में डाल दे।
नेपाल के शासक ने अंग्रेजों के विद्रोहियों को नेपाल में शरण लेने से रोकने के साथ ही साथ क्रांतिकारियों को पड़कर उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया। 1857 के विद्रोह को दबाने के लिए नेपाल के शासक ने 
अंग्रेजों की सेना को सैनिक सहायता प्रदान की थी।
नेपाल ने अपनी सेना को अंग्रेजों की सेना में शामिल होने के लिए भेजा, जिसने विद्रोह को दबाने में मदद की। 
1857 की क्रांति में राजस्थान के तीन राजाओं ने क्रांतिकारियों का समर्थन किया, वे थे,जयपुर के महाराजा सवाई द्वितीय:
उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराजा तख्त सिंह,
जोधपुर के इस महाराजा ने भी विद्रोहियों का समर्थन किया था।
उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह ने भी क्रांतिकारियों का समर्थन किया था।
इन राजाओं ने विद्रोहियों को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान की थी।

1857 की क्रांति में नेपाल के शासक जंग बहादुर का अंग्रेजों के समर्थन का कई कारण था।
1816 की सुगौली संधि के बाद, नेपाल और अंग्रेजों के बीच नेपाल के शासक अंग्रेजों को अपने पड़ोसी और सहयोगी के रूप में देखते थे।नेपाल में उस समय राणा शासन था, जो अंग्रेजों के प्रति बहुत वफादार था। राणा शासकों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर नेपाल को बाहरी प्रभावों से बचाने की इसलिए कोशिश की थी कि उन्हें 
विद्रोहियों से खतरा महसूस हो रहा था।
नेपाल के शासक विद्रोहियों को एक गंभीर खतरा मानते थे। 
नेपाल ने अपनी सेना को अंग्रेजों की सेना में शामिल होने के लिए भेजा, जिसने विद्रोह को दबाने में मदद की। विद्रोहियों के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा चलाए गए अभियान में भाग लिया।
 
1857 के विद्रोह के दौरान, कुछ प्रमुख ग्रामीण इलाकों में आंदोलन हुए थे, जिनमें अवध, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश शामिल थे। अवध में, किसानों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें लगान अधिक लगने लगा था और उन्हें लगान के भुगतान के लिए बेदखल किया जा रहा था। बिहार के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें भू-राजस्व प्रणाली से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा था. मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें ब्रिटिश शासन की नीतियों से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा था। 
 उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें ब्रिटिश शासन की नीतियों से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा था। 
झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, झांसी इस इलाके में विद्रोह का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। 
लखनऊ भी विद्रोह का एक केंद्र था, जहाँ बेगम हज़रत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया था।
मध्य भारत के कई ग्रामीण इलाकों में भी विद्रोह हुए थे, जैसे कि छोटा नागपुर और संथाल परगना।
बिहार में भी कई जगहों पर विद्रोह हुए थे, जैसे कि आरा, जगदीशपुर, जहां कुंवर सिंह ने नेतृत्व किया था।
इनके अलावा, कई अन्य ग्रामीण इलाकों में भी 1857 के विद्रोह के दौरान आंदोलन हुए थे, जैसे कि पलामू, सिंहभूम, देवराज, आदि।



कुल मिलाकर, 1857 की क्रांति में नेपाल ने अंग्रेजों का समर्थन किया, जिससे विद्रोहियों को दबाने में अंग्रेजों को मदद मिली.


1857 के विद्रोह के दौरान, अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की मदद से कुछ स्थानों पर कब्जा कर लिया था। दिल्ली और कानपुर जैसे महत्वपूर्ण शहरों पर अंग्रेजों ने विद्रोहियों से वापस कब्जा करने के लिए गोरखा सैनिकों का उपयोग किया था। इसके अलावा, अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की मदद से उत्तर-पश्चिमी प्रांतों और अवध के कुछ हिस्सों पर भी कब्जा कर लिया
1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान, अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की मदद से कुछ महत्वपूर्ण शहरों और क्षेत्रों पर फिर से कब्जा कर लिया था। दिल्ली, जो विद्रोहियों के नियंत्रण में थी, को सितंबर 1857 तक अंग्रेजों ने वापस ले लिया, जिसमें गोरखा सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसी तरह, कानपुर भी विद्रोहियों के नियंत्रण में था, जिसे जुलाई 1857 के मध्य तक अंग्रेजों ने फिर से हासिल कर लिया, जिसमें गोरखा सैनिकों का समर्थन मिला था। 
इसके अलावा, अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की सहायता से उत्तर-पश्चिमी प्रांतों और अवध के कुछ हिस्सों पर भी विद्रोहियों से वापस ले लिया 

विद्रोह का तात्कालिक कारण नई राइफल के कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह थी, जिससे सिपाहियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं.
विद्रोह 10 मई, 1857 को मेरठ में हुआ, जहां सिपाहियों ने कंपनी की सेना के अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया.
मेरठ से विद्रोह दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झांसी, बनारस, आरा, जौनपुर, प्रयाग, फतेहपुर, और बिहार के कई अन्य शहरों में फैल गया.
इस विद्रोह में सिपाही, किसान, जमींदार, और स्थानीय शासक शामिल हुए.थे
1857 के विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश सेना ने कई कठोर कदम उठाए, जिसमें कई भारतीय नेताओं और सिपाहियों को फांसी दी गई.





मंगल पांडे, रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहिब, तात्या टोपे, और बहादुर शाह जफर
इस क्रांति ने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया और ब्रिटिश सरकार ने सीधे भारत पर शासन करना शुरू कर दि

नेपाल की अंग्रेजों के साथ मैत्री:
1816 की सुगौली संधि के बाद, नेपाल और अंग्रेजों के बीच एक मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गया था। नेपाल के शासक अंग्रेजों को अपने पड़ोसी और सहयोगी के रूप में देखते थे. 
नेपाल की आंतरिक स्थिति:
नेपाल में उस समय राणा शासन था, जो अंग्रेजों के प्रति बहुत वफादार था। राणा शासक ने अंग्रेजों के साथ मिलकर नेपाल को बाहरी प्रभावों से बचाने की कोशिश की. 
विद्रोहियों से खतरा:
नेपाल के शासक विद्रोहियों को एक गंभीर खतरा मानते थे। वे नहीं चाहते थे कि विद्रोह नेपाल में फैल जाए और उनकी सत्ता को खतरे में डाल दे.
नेपाल के शासक ने विद्रोहियों को नेपाल में शरण लेने से रोका और उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया. 
अंग्रेजों की सेना को सैनिक सहायता प्रदान किया:
नेपाल ने अपनी सेना को अंग्रेजों की सेना में शामिल होने के लिए भेजा, जिसने विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों की मदद किया. 
नेपाल के शासक ने अंग्रेजों के साथ मिलकर विद्रोहियों के खिलाफ अभियान में भाग लिया. 
कुल मिलाकर, 1857 की क्रांति में नेपाल ने अंग्रेजों का समर्थन किया, जिससे विद्रोहियों को दबाने में अंग्रेजों को मदद मिली.



 कुछ प्रमुख ग्रामीण इलाकों में आंदोलन हुए थे, जिनमें अवध, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश शामिल थे। इन क्षेत्रों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि वे ब्रिटिश शासन की नीतियों से प्रभावित थे. 
अवध: अवध में, किसानों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें लगान अधिक लगने लगा था और उन्हें लगान के भुगतान के लिए बेदखल किया जा रहा था.
बिहार: बिहार के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें भू-राजस्व प्रणाली से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा था.
मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें ब्रिटिश शासन की नीतियों से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा था. 
उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में किसानों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, क्योंकि उन्हें ब्रिटिश शासन की नीतियों से नुकसान हो रहा था और उन्हें लगान अधिक लगने लगा 
अवध:
अवध में, विद्रोह का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां न केवल सैनिकों ने बल्कि किसानों और जमींदारों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. 
झांसी:
झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, और इस इलाके में विद्रोह का एक महत्वपूर्ण केंद्र था. 
लखनऊ:
लखनऊ में भी विद्रोह का एक केंद्र था, जहाँ बेगम हज़रत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया था. 
मध्य भारत के कई क्षेत्र:
मध्य भारत के कई ग्रामीण इलाकों में भी विद्रोह हुए थे, जैसे कि छोटा नागपुर और संथाल परगना. 
बिहार:
बिहार में भी कई जगहों पर विद्रोह हुए थे, जैसे कि आरा, जगदीशपुर, जहां कुंवर सिंह ने नेतृत्व किया था. 
इनके अलावा, कई अन्य ग्रामीण इलाकों में भी 1857 के विद्रोह के दौरान आंदोलन हुए थे, जैसे कि पलामू, सिंहभूम, देवराज, आदि. 
विद्रोह के दौरान, ग्रामीण इलाकों के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ इसलिए विद्रोह किया क्योंकि वे उनके द्वारा लगाए गए कठोर करों, ज़मीन के अधिकारों से वंचित होने, और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने 2 जून 1858 को किले पर बागी सेना का परचम फहरा दिया था। रानी के आते ही जयाजी राव सिंधिया भागकर अंग्रेजों के पास आगरा पहुंच गए। ग्वालियर किले पर झांसी की रानी ने किया थ
- जनवरी 1858 में अंग्रेज सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू किया और मार्च में शहर को घेर लिया था।
- हफ्तों की लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी बेटे दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भाग निकलने में सफल रहीं। रानी झांसी से कालपी पहुंचीं और तात्या टोपे से जा मिलीं।
- 22 मई को करैरा में रानी की सेना को जनरल ह्यूरोज की अंग्रेजी सेना से फिर हारना पड़ा।
- इसके बाद ह्यूरोज ने कालपी को घेर लिया, रानी को वहां से भी भागना पड़ा।
- तात्या और रानी की संयुक्त सेनाओं के ग्वालियर आने की खबर सुन कर अंग्रेजों से नाराज ग्वालियर की सेना ने विद्रोह कर दिया।
- 1 जून की शाम ग्वालियर की विद्रोही सेना के सहयोग से रानी ने शहर के घास मंडी की तरफ से ग्वालियर के अजेय किले को घेर लिया।
- 2 जून को सुबह ग्वालियर की सेना की बताई कमजोर प्राचीर को तोड़ कर विद्रोही सेना ने किले पर कब्जा कर लिया।
- ग्वालियर के कम उम्र महाराजा जयाजीराव सिंधिया कूटनीति के तहत भाग कर अंग्रेजों की शरण में आगरा चले गए।
- ग्वालियर विजय की खबर सुनकर बिठूर से नाना साहेब पेशवा भी ग्वालियर किले पर रानी से आ मिले।
नाना की अदूरदर्शिता से हारी रानी
- रानी जानती थी कि जब तक ग्वालियर की सेना उसके साथ है और वह अंग्रेजों को घेरकर हरा सकती है।
- रानी को मालूम था कि अंग्रेज जयाजी राव सिंधिया को जल्दी ही ज्यादा सैनिक देकर आगरा से ग्वालियर भेजेंगे।
-विद्रोहियों की सेना का मनोबल बना रहे, इसके लिए ज्यादा अंग्रेज सैनिक आने से पहले ही पूरा होल्ड रानी करना चाहती थी।
-इस प्रयास में नाना थोड़े ढीले हो गए और दुर्ग में आमोद-प्रमोद में लग गए। जिससे अंग्रेज सैनिकों को एकत्र होने का मौका मिल गया।
- रानी की आशंका के मुताबिक ही अंग्रेजों ने जयाजीराव को आगे कर ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया, तो ग्वालियर की सेना ने हथियार डाल दिए।
- रानी कोे किले से बाहर निकलना पड़ा, और उनके बलिदान के बाद आजादी के लिए लड़ रही सेना तितरबितर हो गई!

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