आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता—यह मानवता पर हमला है, और हर निर्दोष की मौत पर हमारी आँखें नम हैं” – राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल
कपिलवस्तु:
जब पहाड़ों की मुस्कान लहूलुहान हो, नदियाँ सिसकने लगें और वादियाँ खामोश चीखों से भर जाएँ—तो केवल ज़मीन ही नहीं, पूरा आसमान भी मातम में डूब जाता है। जम्मू-कश्मीर की सुरम्य पहलगाम घाटी में हुआ हालिया आतंकी हमला ऐसा ही एक हृदयविदारक हादसा है, जिसने भारत ही नहीं, नेपाल समेत समूचे उपमहाद्वीप की अंतरात्मा को झकझोर दिया।
हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस अमानवीय कृत्य के पीछे छिपे षड्यंत्रकारियों को बेनकाब किया जाए, उन्हें अपमानित किया जाए, और उनकी हर साज़िश उन्हीं पर उलट जाए। आमीन।
इस हमले में बुटवल के युवा पर्यटक सिधीप न्यौपाने अपनी माँ, बहन और बहनोई के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने पहुँचे थे। लेकिन वे लौटे—ताबूत में लिपटे हुए। उनका परिवार, जो किसी तरह जान बचाकर लौट पाया, आज भी उस मंजर की याद से सिहर उठता है। गोलीबारी जंगल की ओर से हुई और परिजनों के अनुसार, वे किसी तरह भागकर बचने में सफल रहे।
नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संवेदना संदेश भेजते हुए जो मानवीयता, संवेदनशीलता और सच्चाई दिखाई, वह दर्शाता है कि सीमाएँ भले भौगोलिक हों, दिलों को बाँट नहीं सकतीं। विदेश मंत्रालय का वक्तव्य कि “निर्दोष पर्यटकों पर हमला किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है,” केवल राजनयिक औपचारिकता नहीं, बल्कि यह मानवता की सच्ची पुकार है।
झंडानगर स्थित जामिया सिराजुल उलूम के शिक्षक और राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल ग़नी अलक़ूफ़ी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा: “आतंकवाद किसी धर्म का प्रतिनिधि नहीं, यह शैतानी सोच है। हम इस बर्बर कृत्य की कठोर निंदा करते हैं और वैश्विक मानवता के आदर्शों की पुनः स्थापना की माँग करते हैं। सीमाएँ हमें बाँट सकती हैं, लेकिन दिलों में मानवता और भाईचारे की भावना को नहीं मिटा सकतीं।”
वहीं, राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल के महासचिव मौलाना मशहूद ख़ान नेपाली ने अपने बयान में कहा: “नेपाल की धरती सदा से धार्मिक सहिष्णुता, भाईचारे और मानवता की मिसाल रही है। लेकिन आज कुछ तत्व हमारी सामाजिक एकता को तोड़ने की साज़िश रच रहे हैं। आतंकवाद धर्म नहीं, विकृत मानसिकता का परिणाम है। हमें मिलकर इसका विरोध करना होगा, ताकि शांति और प्रेम का वातावरण पुनः स्थापित हो।”
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस त्रासदी को कुछ शरारती तत्वों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणास्पद नारों के ज़रिए भुनाने का प्रयास किया। “आतंकी मुसलमानों को निकालो” जैसे नारे न केवल नेपाल के संविधान और सामाजिक ताने-बाने का अपमान हैं, बल्कि उन लाखों मुसलमानों का भी अपमान हैं जो नेपाल की मिट्टी के सच्चे सपूत हैं।
जनकपुर में ऐसे नारे लगे और कृष्णनगर में कुछ असामाजिक तत्वों ने नफ़रत फैलाने की कोशिश की, जिससे सदियों पुरानी सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा को आघात पहुँचा।
इससे भी अधिक खतरनाक वे झूठी अफवाहें थीं जिनमें कहा गया कि हमलावरों ने पहले नाम पूछा, कपड़े उतरवाए और पहचान के बाद गोलियाँ चलाईं — जबकि सिधीप न्यौपाने के परिवार और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान इससे बिलकुल भिन्न हैं। इन अफवाहों का एकमात्र उद्देश्य है—मुसलमानों को कलंकित करना, अस्थिरता फैलाना और भय का वातावरण बनाना।
यह षड्यंत्र केवल किसी एक समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि नेपाल की गंगा-जमुनी संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है, जिस पर कठोर अंकुश लगाया जाना चाहिए।
यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व में आतंकवाद का सबसे अधिक शिकार स्वयं मुस्लिम समाज ही रहा है — ग़ज़ा, यमन, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान — जहाँ अधिकतर मृतक मुसलमान हैं। अतः आतंकवाद को किसी मज़हब से जोड़ना इतिहास और इंसाफ दोनों के साथ बेईमानी है।
इसी संदर्भ में मुस्लिम वर्ल्ड लीग (MWL) का मक्का मुकर्रमा से आया बयान उल्लेखनीय है। महासचिवालय ने स्पष्ट रूप से कहा: “हर वह कृत्य जो घृणा, हिंसा और आतंक फैलाने के लिए किया जाए, मानवता के विरुद्ध है और हम उसकी घोर निंदा करते हैं।” यह संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैश्विक मुस्लिम समाज की प्रतिनिधि आवाज़ है और यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद न किसी धर्म का है, न संस्कृति का—बल्कि यह शुद्ध रूप से शैतानी सोच का प्रतिबिंब है।
नेपाल के मुस्लिम नागरिक — जो विदेशों में मेहनत और ईमानदारी से नेपाल का नाम रोशन कर रहे हैं — न केवल ऐसे किसी भी आतंकवादी कृत्य से असंबद्ध हैं, बल्कि उनकी घोर निंदा करते हैं।
नेपाली मुसलमानों की ओर से जारी संयुक्त वक्तव्य में कहा गया: “हम पहलगाम हमले की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं और सिधीप न्यौपाने सहित सभी पीड़ित परिवारों के दुख में सहभागी हैं। साथ ही हम सरकार से माँग करते हैं कि जनकपुर, कृष्णनगर और अन्य क्षेत्रों में फैलाई जा रही अफवाहों और घृणा अभियानों पर तत्काल कार्रवाई हो, ताकि नेपाल की संवैधानिक गरिमा और सामाजिक समरसता बनी रहे।”
हम इस माँग का पूर्ण समर्थन करते हैं। आज समय की पुकार है कि पूरा नेपाल — हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, ईसाई — एक स्वर में आतंकवाद और नफ़रत के विरुद्ध खड़ा हो।
हम कुरआन की इस आयत को दोहराते हैं: “जिसने किसी एक निर्दोष की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या की।” (क़ुरआन 5:32)
यह केवल धार्मिक वाणी नहीं, बल्कि मानवता की आत्मा की पुकार है। इसी सुर्खी को ठीक कीजिए बाकी सब यहीं रहे