सरकारी स्कूल बेहतर होते तो प्राइवेट स्कूल की छात्रा रिया जान नहीं देती
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
शिक्षा देश की उन्नति और विकास की संवाहक है ही, प्रत्येक महत्वाकांक्षी समाज की सर्वोच्च प्राथमिकता है। शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार भी है।मानवता के सर्वोत्तम आदर्शों का स्तम्भ है।
"शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की उस क्षमता को बढ़ाना हैरान जिससे उसमें हर समस्या के हल करने और हर चुनौती के साथ चलने की योग्यता पैदा हो सके।
" प्रसिद्ध दार्शनिक और चिन्तक महर्षि अरविद के अनुसार - सच्ची और वास्तविक शिक्षा केवल वही है जो मानव की अन्तर्निहित समस्त शक्तियों को इस प्रकार विकसित करती है कि वह उनसे पूर्णरुपेण लाभान्वित होता है।"
शिक्षा किसी भी देश के विकास की बुनियाद होती है। किसी भी राष्ट्र की आधार शिला होती है। यह केवल अतीत युगों की उपलब्धियों तथा वर्तमान परिस्थितियों का संधि स्थल ही नहीं, ऐसा आलोक भी है जिसमें भविष्य की रुप रेखा निखरती है।
शिक्षा संस्थानों से राष्ट्र के भावी कर्णधार तैयार होते है। वास्तव में शिक्षा अपने भौगोलिक परिवेश से रागात्मक लगाव भी पैदा करती है, और राष्ट्र के प्रति प्रबुद्ध चेतना का निर्माण भी करती है।
जिस प्रकार शरीर में हृदय सब अंगों को स्वस्थ रक्त पहुँचाने का कार्य करता है, उसी प्रकार शिक्षा-समाज, और राष्ट्र के शासन, विज्ञान, कला, साहित्य, प्रशासन, देश रक्षा सभी क्षेत्रों में अपना परोक्ष रूप से योगदान देती है। अर्थात शिक्षा स्थल ज्ञान का सागर के समान है जहां पवित्रता के साथ शिक्षा का सागर बहता है। लेकिन आज शिक्षा स्थल जिसे विद्यालय,स्कूल या कालेज कहते हैं, क्या वे पूर्व की तरह पवित्र व निस्वार्थ रह पाए?
कहना न होगा कि नया शैक्षिक सत्र शुरु होने वाला है और इसी के साथ विद्यालयों में प्रवेश के लिए दौड़ धूप �