2081 का अंत: ज़ख्मों की दास्तान, और 2082 की उम्मीदों का नया सूरज- मौलाना मशहूद खां नेपाली
जब 2081 की शाम धीरे-धीरे ढली, तो वह केवल एक साल का अंत नहीं था — बल्कि यह एक कड़वी सच्चाई का इज़हार था कि हमने फिर एक साल खो दिया, एक और मौका गँवा दिया, और एक और उम्मीद अधूरी छोड़ दी। जैसे ही 2082 का सूरज उगा, वह न सिर्फ एक नई तारीख लेकर आया, बल्कि उन लाखों दिलों की धड़कनों को भी फिर से जगा गया जो अब भी बेहतरी की राह तक रहे हैं।
2081 का वर्ष नेपाल के इतिहास में मायूसी, बेरुखी और असफलताओं से भरा एक अध्याय बन गया। जिस लोकतंत्र से जनता ने उम्मीदें जोड़ी थीं, वे उम्मीदें बिखरती रहीं, और नेतृत्व करने वालों ने केवल ज़ुबानी दावों से जनता को बहलाने की कोशिश की। सत्ता में बैठे वे चेहरे, जो एक समय में जनता के दर्द को आवाज़ देते थे, आज सत्ता के नशे में मदहोश नजर आए।
संघीय सरकार, जिसने जनता को अधिकारों की चौखट तक लाने का वादा किया था, वह केवल कागज़ी योजनाओं की तस्वीर बनकर रह गई। केंद्र और प्रांतों के बीच विश्वास की डोर टूटी रही, और जनता की ज़िंदगी में सुधार की जगह और भी जटिलताएं पनपती गईं। संसाधनों का असमान वितरण, विकास योजनाओं में बाधा, और मूलभूत सुविधाओं की कमी ने जनता को लाचार और हताश कर दिया।
संसद, जिसे जनता की आवाज़ बनना था, औपचारिक बैठकों का मंच बनकर रह गई। कानून बनाने की प्रक्रिया की जगह अध्यादेशों का बोलबाला रहा, और फ़ैसले उन बंद कमरों में होते रहे जहाँ न जनता की पहुँच थी, न भागीदारी। निर्वाचित प्रतिनिधि जनसेवा के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं की सेवा में लगे रहे, और लोकतंत्र, जिसे जनता की ताक़त माना जाता था, एक मज़ाक बनकर रह गया।
देश का युवा — जिसे राष्ट्र का भविष्य माना जाता है — नौकरी, शिक्षा और सुरक्षा के सपनों के साथ दर-दर की ठोकरें खाता रहा। जब अपने देश में सहारा न मिला, तो जापान, कोरिया, खाड़ी देश, मलेशिया, भारत, सऊदी अरब, दुबई, कतर, कुवैत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, यहाँ तक कि इज़राइल तक उन्हें पलायन करना पड़ा। यह केवल रोज़गार की तलाश नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय त्रासदी है — यह गवाही है इस बात की कि हम अपने ही बच्चों को अपनी मिट्टी से जोड़े रखने में असफल रहे हैं।
एक समय था जब नेपाल को अल्पसंख्यकों का संरक्षक, शांति का प्रतीक, और धार्मिक सौहार्द का उदाहरण माना जाता था। लेकिन 2081 ने इन सपनों को भी धुंधला कर दिया। सेक्युलरिज़्म, जो हमारे संवैधानिक पहचान की बुनियाद है, अब राजनीतिक हथकंडों की भेंट चढ़ चुका है। वे अल्पसंख्यक समुदाय, जो कभी विश्वास के साथ समाज में भागीदार थे, अब खुद को असुरक्षित, उपेक्षित और महत्वहीन महसूस कर रहे हैं। समानुपातिक समावेश, जो प्रतिनिधित्व में संतुलन का उद्देश्य रखता था, अब एक राजनीतिक चाल में बदल चुका है। भाई-भतीजावाद, वंशवादी राजनीति और कुछ गुटों का वर्चस्व इस व्यवस्था पर हावी हो चुका है।
इन हालात में जब 2082 का सूरज उगा, तो उसकी रौशनी एक सवाल बनकर हर दिल पर दस्तक देने लगी: क्या हम यूँ ही खामोश रहेंगे? क्या हम सिर्फ़ नए साल की बधाईयों तक सीमित रहेंगे? क्या हम इंतज़ार करते रहेंगे कि कोई आए और हमारे लिए सब कुछ बदल दे? या हम खुद बदलाव की शुरुआत बनेंगे?
2082 सिर्फ़ एक कैलेंडर नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक विवेक और ज़िम्मेदारी का इम्तिहान है। यह हमें पुकारता है कि हम अपने भीतर झाँकें, अपनी ताक़त को पहचानें, और उस व्यवस्था को आईना दिखाएं जो हमारे सपनों को छीन रही है। अब वक्त है कि हम बोलें, सवाल करें, और एक ऐसा आंदोलन खड़ा करें जो सच्चाई, न्याय और विकास की बुनियाद पर खड़ा हो।
2082 का सूरज जग चुका है — अब समय है जागने का, सोचने का और आगे बढ़ने का।
2082 हम सभी के लिए चेतना, न्याय, परिवर्तन और पुनर्निर्माण का वर्ष बने।
2082 की शुभकामनाएं।