19वां लोकतंत्र दिवस: जनता की आवाज़, लोकतंत्र की रौशनी

काठमांडू, 24 अप्रैल: नेपाल आज 19वां लोकतंत्र दिवस मना रहा है, एक ऐसा दिन जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि हर उस दिल की धड़कन है जो आज़ादी, अधिकार और जनसत्ता में विश्वास रखता है। यह दिन हर उस पल की याद दिलाता है जब जनता की आवाज़ ने तानाशाही की दीवारों को गिराया और लोकतंत्र की सुबह ने अंधकार को मात दी।

लोकतंत्र की ओर एक ऐतिहासिक यात्रा

साल 2059 के जेष्ठ 8 गते को भंग संसद की पुनः स्थापना और 2063 के वैशाख 11 गते को जनआंदोलन की विजय ने यह स्पष्ट किया—"राजकीय शक्ति का स्रोत नेपाली जनता है।" यह सिर्फ नारा नहीं था, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की पुकार थी। 2062/63 का जनआंदोलन सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना की क्रांति था।

संविधान: बलिदानों का सजीव दस्तावेज

इन जनबलिदानों की नींव पर बनीं दो संविधान सभाएं और 2072 के आश्विन 3 गते को नेपाल ने इतिहास रचा—"संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य नेपाल का संविधान"। यह दस्तावेज सिर्फ विधिक भाषा नहीं, बल्कि बलिदानों की महक और संकल्पों की गूंज है, जो आज संघीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों के माध्यम से जनसेवा में परिणत हो रही है।

जनता की सेवा में लोकतंत्र

आज सरकारें आपदा के समय जनता के द्वार पर हैं, और संसद में आम जनता की आवाज़ें गूंज रही हैं। यही है लोकतंत्र की सफलता और संघीयता की सुंदरता, जो दूरियों को मिटाकर दिलों को जोड़ रही है।

लोकतंत्र दिवस: एक प्रेरणा, एक प्रतिबद्धता

लोकतंत्र दिवस केवल अतीत की गाथा नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प है—जनभागीदारी, समानता और चेतना का उत्सव। मौलाना मशहूद ख़ान नेपाली ने इस अवसर पर कहा, "लोकतंत्र दिवस वास्तव में एक संकल्प है—एक वादा, कि जब भी अंधकार बढ़ेगा, जनता फिर उठेगी और लोकतंत्र का सूरज फिर उगेगा।"

उन्होंने समस्त नेपाली जनता को इस ऐतिहासिक दिन की बधाई देते हुए प्रार्थना की कि सर्वशक्तिमान अल्लाह नेपाल को शांति, तरक्की और खुशहाली प्रदान करे, और लोकतंत्र की यह रौशनी युगों तक जगमगाती रहे।



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