विश्व जल दिवस पर विशेष रिपोर्ट विश्व में शांति की स्थापना में जल का महत्व



परमात्मा प्रसाद उपाध्याय

 बढ़नी सिद्धार्थनगर 

  "विश्व जल दिवस 2024 का थीम 'शांति के लिए जल रहा ' है। जब हम पानी पर सहयोग करते हैं, तब हम एक सकारात्मक प्रभाव पैदा करते हैं - सद्भाव को बढ़ावा देते हैं, समृद्धि पैदा करते हैं और साझा चुनौतियों के लिए लचीलापन बनाते हैं। 

हमें इस अहसास पर काम करना चाहिए कि पानी केवल इस्तेमाल और प्रतिस्पर्धा करने वाला संसाधन नहीं है - यह एक मानव अधिकार है, जो जीवन के हर पहलू में अंतर्निहित है। इस विश्व जल दिवस पर, हम सभी को पानी के इर्द-गिर्द एकजुट होने और शांति के लिए पानी का उपयोग करने की आवश्यकता है, जिससे एक अधिक स्थिर और समृद्ध कल की नींव रखी जा नींव रखी जाय 
विश्व जल दिवस' की अंतरराष्ट्रीय पहल 'रियो डि जेनेरियो' में 1992 में आयोजित 'पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' (यू एन सी ई डी) में की गई थी,
  सर्वप्रथम पहली बार 22 मार्च 1993के दिन पूरे विश्व में 'जल दिवस' के मौके पर जल के संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता फैलाने का कार्य किया गया था 
 22 मार्च याने विश्व जल दिवस, पानी बचाने के संकल्प का दिन, पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन है। 
बताया जाता है कि धरती का लगभग 3 चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है, लेकिन इसमें से 97 प्रतिशत पानी खारा है और सिर्फ 3 प्रतिशत पानी ही पीने योग्य है. इसमें भी 2 प्रतिशत पानी ग्लेशियर व बर्फ के रूप में है. इस तरह मात्र 1 प्रतिशत पानी ही मानव के प्यास बुझाने के उपयोग के लिए उपलब्ध है 
। इस एक प्रतिशत पानी का 60 वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का 40 वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ़-सफ़ाई में खर्च करते हैं।          


 समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। पहले कहा जाता था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं

 कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दीजिए, हमारे गाँव-मोहल्लों से कुएं और तालाब आज गायब हो रहे हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।

भारत में जल संसाधन समुचित मात्रा में उपलब्ध हैं, साथ ही यहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा भी होती है जिसके संरक्षण की पारंपरिक विधि से लोग भली भाँति परिचित हैं।
 जल को पूजनीय मानकर विभिन्न अनुष्ठानों, सांस्कृतिक प्रथाओं आदि में इसका उपयोग किया जाना एक सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। जो जल के उपयोग संबंधी ज्ञान के आधार पर हमारी पारंपरिक विरासत के मूल्य की पुष्टि करता है।
 उत्तराखंड में ऐसा माना जाता है कि सभी सिंचाई चैनलों में पानी की आत्मा (मसान) मौजूद है जो फसलों की सुरक्षा के लिये आवश्यक है।

राजस्थान में मानसून के पहले एक पर्व मनाया जाता है जिसे ‘लसिपा’ कहते हैं। इस पर्व के दौरान गाँव के समस्त लोग एकत्र होकर सभी जल निकायों की सफाई करते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। 

अंततः यह अनुष्ठान एक सामुदायिक दावत के साथ समाप्त होता है। अरुणाचल प्रदेश में ज़ीरो घाटी की प्राचीन ‘अपातानी जनजाति’ इसका एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है। वे धान के साथ मछली की भी सह-खेती करते हैं
जीरो घाटी एक पठार है, जहाँ घरों के उपयोग तथा कृषि सिंचाई के लिये पानी का मुख्य स्रोत एक छोटी नदी और कुछ जल-कुएँ है। सिंचाई हेतु नहरों और चैनलों के एक नेटवर्क के माध्यम से पूरी घाटी में धान के खेतों की सिंचाई की जाती है
आमतौर पर महिलाएँ इन खेतों का प्रबंधन करती हैं। धान के खेतों में इस्तेमाल होने वाला यह पानी बहकर घाटी में और खेतों में जाता है। बाद में पुनः वापस उस छोटी धारा में विलीन हो जाता है जो नदी में वापस मिलती है। 
इस तरह से यह घाटी में पानी का बारहमासी स्रोत है। साल 2021 में विश्व जल दिवस (World Water Day 2021) की थीम 'वेल्यूइंग वॉटर' यानी पानी को महत्व देना तय की गई थी. उस साल यह थीम रखने का लक्ष्य यह था कि समय के साथ और बढ़ती जनसंख्या के दौरान साफ पानी हर किसी को नसीब हो सके 

. साल 2020 में विश्व जल दिवस की थीम 'जल और जलवायु परिवर्तन' रखी गई थी विश्व जल दिवस 2024 का थीम "शांति के लिए जल" है। यह थीम जल संसाधनों के प्रबंधन में सहयोग के महत्व और साथ मिलकर काम करने से वैश्विक सद्भाव में कैसे योगदान मिल सकता है, इस पर प्रकाश डालती है। पानी की कमी और प्रदूषण तनाव के स्रोत हो सकते हैं, जबकि साझा जल संसाधनों के प्रबंधन पर सहयोग शांति और स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।

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