नेपाल में संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन: मौलाना मशहूद खां नेपाली
नेपाल में संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन: मुस्लिम अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व नजरअंदाज, सरकार के फैसले पर कड़ी आलोचना
नेपाल सरकार ने हाल ही में पांच प्रमुख देशों के लिए राजदूतों की नियुक्ति की घोषणा की है, लेकिन मुस्लिम अल्पसंख्यकों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर एक बार फिर संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया है। यह कदम नेपाल के संविधान की धारा 282 (1) में उल्लिखित "समावेशी सिद्धांत" का खुला उल्लंघन है, जो हर समुदाय, धर्म और वर्ग को समान अधिकार और प्रतिनिधित्व की गारंटी देता है।
राष्ट्रिय मदरसा संघ नेपाल के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल गनी अल्कूफी ने इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा:
"यह फैसला मुस्लिम अल्पसंख्यकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की साजिश है। नेपाल के संविधान में स्पष्ट रूप से सभी वर्गों को समान अधिकारों की गारंटी दी गई है, लेकिन यह फैसला न केवल संविधान का उल्लंघन है बल्कि मुस्लिम समुदाय के साथ हो रहे लगातार अन्याय का प्रमाण है। हम इस कदम को पूरी तरह से खारिज करते हैं और सरकार से तत्काल इस अन्याय को समाप्त करने की मांग करते हैं। मुस्लिम समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हर कानूनी और संवैधानिक रास्ता अपनाएगा।"
मौलाना मशहूद खां नेपाली का सख्त रुख
राष्ट्रिय मदरसा संघ नेपाल के महासचिव और माओवादी केंद्र लुम्बिनी प्रदेश के सदस्य मौलाना मशहूद खां नेपाली ने इस कदम को अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला करार दिया। उन्होंने कहा:
"यह न केवल संविधान के समावेशी सिद्धांतों का उल्लंघन है बल्कि सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को लगातार नजरअंदाज करने का सिलसिला भी है। नेपाल के मुस्लिम नागरिक इस देश के विकास और स्थिरता में समान भागीदार हैं, लेकिन सरकार का यह रवैया उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक साबित करने की नाकाम कोशिश है। हम सरकार से जोरदार अपील करते हैं कि अल्पसंख्यकों को उनके संवैधानिक अधिकार दिए जाएं और इस भेदभावपूर्ण रवैये को तुरंत समाप्त किया जाए।"
भेदभावपूर्ण रवैये का स्पष्ट उदाहरण
पुर्तगाल, दक्षिण अफ्रीका, बेल्जियम, मलेशिया और डेनमार्क के लिए नियुक्त किए गए राजदूतों की सूची में किसी भी मुस्लिम प्रतिनिधि की अनुपस्थिति नेपाल के संवैधानिक सिद्धांतों के उल्लंघन का स्पष्ट प्रमाण है। यह कदम मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जारी भेदभावपूर्ण व्यवहार की निरंतरता है, जिससे बार-बार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
न्याय की मांग
मुस्लिम नेताओं और जनता ने इस फैसले को सख्ती से खारिज करते हुए सरकार से तुरंत पुनर्विचार की मांग की है। यह फैसला नेपाल के लोकतांत्रिक और समावेशी पहचान पर एक काला धब्बा बन चुका है।
मुस्लिम समुदाय ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा। इस मामले में सरकार की चुप्पी या देरी पूरे न्याय प्रणाली पर सवाल खड़ा कर देगी। अब समय आ गया है कि सरकार अल्पसंख्यकों के साथ न्याय करे, उनके संवैधानिक अधिकार प्रदान करे और उनके साथ हो रहे भेदभावपूर्ण व्यवहार को तुरंत समाप्त करे।